कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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'ठीक है' ऐसा कहकर दासी द्वारा प्रार्थित किया गया पाचक, ऋतुपर्ण से आज्ञा लेकर
दमयन्ती के पास आया ॥४५॥
तब उसे देखकर दमयन्ती बोली-रसोईए का रूप धारण किये हुए तुम यदि राजा नल
हो, तो चिन्ता-समुद्र में डूबी हुई मुझे आज पार लगाओ' ॥४०६॥
यह सुनकर स्नेह दुःख और लज्जा से व्याकुल राजा नल नीचे मुंह किये हुए आँसुओं से
दबे गले से अन्दर की बात बोला—॥४०७॥
'हाँ मैं वही वज्र-सा कठोर पापी नल हूँ। तुम्हें सन्तप्त करते हुए मैंने नल होकर भी
अनल (अग्नि) का काम किया है'॥४०८॥
इस प्रकार कहते हुए नल से दमयन्ती ने पूछा कि यदि ऐसा है, तो तुम इतने कुरूप कैसे
हो गये ? ॥४०९॥
इस प्रकार पूछती हुई दमयन्ती को नल ने अपना पिछला सारा समाचार-कार्कोटक को
आग से निकालने से लेकर कलियुग के शरीर से निकलने तक का-सुना डाला ॥४१०॥
और, उसी समय कार्कोटक के दिये हुए अग्नि से शुद्ध वस्त्रों को पहनकर वह नल फिर
से अपने पुराने और वास्तविक रूप में आ गया ॥४११॥
पुनः अपने सच्चे रूप में आये हुये सुन्दर नल को देखकर खिले हुए कमल के समान मुख
वाली दमयन्ती ने आँखों के आँसुओं से दुःख-दावानल के शान्त हो जाने पर अवर्णनीय आनन्द
का अनुभव किया ॥४१२॥
नल के मिल जाने से अत्यन्त प्रसन्न सेवक-सेविकाओं द्वारा नल का सहसा प्रकट हो जाना
जानकर, उस विदर्भराज भीम ने वहाँ आकर नल का समुचित अभिनन्दन और समुचित आदर
सत्कार करके अपने नगर को महोत्ससमय बना दिया ॥४१३॥
तदनन्तर, मन-ही-मन हँसते हुए राजा भीम के द्वारा समुचित रूप से सत्कृत राजा
ऋतुपर्ण भी नल को बधाई देकर कोशल देश को चला गया ॥४१४॥
इसके पश्चात् निषध देश के राजा नल ने कलियुग की दुष्टता के कारण होनेवाले उपद्रव
को, राजा भीम को सुनाकर, अपनी प्राणप्यारी दमयन्ती के साथ वहीं सुखपूर्वक निवास
किया ॥४१५॥
कुछ ही दिनों के अनन्तर धर्मात्मा राजा नल ने अपने श्वशुर की सेनाओं के साथ निषध
देश में जाकर और अपने भाई पुष्कर को पाशों के विज्ञान से जीतकर उसे आज्ञाकारी बना
लिया। देह से द्वापर के निकल जाने पर, पाश्चात हुए छोटे भाई पुष्कर को उसका अपना भाग देकर
नल अपनी प्राणप्रिया दमयन्ती के साथ अपने राज्य का पुनः विधिवत् शासन करने लगा ॥४१६॥
तारापुर नगर में इस प्रकार कथा सुना कर ब्राह्मण सुमन ने प्रोषितपतिका राजकुमारी
बन्धुमती से फिर कहा—॥४१७॥
'हे राजपुत्री बड़े-बड़े लोग भी इस प्रकार का असह्य कष्ट भोगकर पुनः कल्याण
प्राप्त करते हैं। सूर्य के समान प्रचंड तेजस्वी भी अस्त का अनुभव करके फिर उदय
होते हैं ॥४१८॥