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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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Page 734

नवम लम्बक १८७
रथ के वेग से राजा ऋतुपर्ण का वस्त्र गिर गया। तब रथ को रोकने के लिए कहते हुए
राजा ऋतुपर्ण से नल ने कहा कि 'राजन् तुम्हारा वह वस्त्र कहाँ गिरा यह पता नहीं लगेगा
क्योकि यह रथ अनेक योजन आगे आ चुका है' ॥१७५-१७६॥
यह सुनकर राजा ऋतुपर्ण नल से बोला—'तू मुझे रथ चलाने की क्रिया बता। मैं तुझे
पाशा फेंकने का तरीका बताता हूँ और उसका ज्ञान भी अभी कराता हूँ जिससे पासे
अपने वश में हो जाते हैं और संख्या भी मालूम हो जाती है' ॥१७७-१७८॥
'यह सामने जो वृक्ष दीख रहा है उसके पत्तों और फलों को गिनकर मैं तुम्हें बताता हूँ
और फिर तुम भी उसे गिनकर देखो' ॥१७९॥
ऐसा कहकर ऋतुपर्ण ने उस पेड़ के जितने पत्ते और फल बताये वे नल के गिनने पर उतने
ही निकले ॥१८०॥
तब राजा नल ने ऋतुपर्ण को रथ-संचालन-विद्या बता दी और राजा ऋतुपर्ण ने उसे
अक्ष-विद्या (द्यूत-कला) ॥१८१॥
तब नल ने उस विद्या की परीक्षा एक दूसरे पेड़ पर की और उसने उसे भली भाँति
सही पाया ॥१८२॥
यह जानकर राजा नल जब प्रसन्न हुआ तब उसके शरीर से एक काला पुरुष निकला।
राजा ने उससे फिर पूछा—'तू कौन है ॥१८३॥
वह बोला—'मैं कलियुग हूँ। दमयन्ती के द्वारा तेरा वरण करने पर मैं ईर्ष्या से तेरे शरीर
में घुसा। इसी कारण जुआ खेलने से तेरी सम्पत्ति नष्ट हो गई ॥१८४॥
तदनन्तर, वन में तुझ डँसते हुए कर्कोटक ने तुझे नहीं डँसा बल्कि मुझे डँसा। देख यह
जला हुआ मैं तेरे सामने खड़ा हूँ ॥१८५॥
व्यर्थ ही दूसरे का अपकार करना किसके लिए कल्याणकारी होता है। इसलिए,
बेटा अब मैं जाता हूँ। अब तुमरो में मेरे रहने का स्थान नहीं है' ॥१८६॥
ऐसा कहकर वह कलि अदृश्य होगया और नल भी उसी समय पहले के समान धर्मात्मा
और तेजस्वी हो गया ॥१८७॥
तब नल ने आकर और रथ पर बैठकर वेग से उसी दिन उस राजा ऋतुपर्ण को
विदर्भ देश में पहुँचा दिया ॥१८८॥
वह राजा ऋतुपर्ण वहाँ के लोगो द्वारा हँसी का पात्र बनाया जाता हुआ वहीं राजभवन
के पास ठहरा ॥१८९॥