कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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त्रिभुवनपुर नामक नगर में मैं त्रिभुवन नाम का राजा था। वहीं पर एक पाशुपत
(शैव) ने बहुत दिनों तक मेरी सेवा की ॥२१२॥
२१३वां श्लोक त्रुटित है ॥२१३॥
एकबार मैंने एकान्त में उसकी सेवा का कारण पूछा तो उसने गुफा-स्थित खड्ग (तलवार)
की सिद्धि के लिए मेरी सहायता माँगी और मैंने उसे स्वीकार भी किया ॥२१४॥
तब उसने मेरे साथ जंगल में जाकर रात्रि में हवन आदि करके एक गुफा प्रकट की और मुझसे
कहा—॥२१५॥
'हे वीर, पहले इस गुफा में प्रवेश करो। प्रवेश करने पर तुम्हें एक खड्ग मिलेगा। तब
तुम बाहर निकलकर मुझे भी अन्दर ले जाना। मेरे साथ प्रतिज्ञा करो ॥२१६॥
उसके इस प्रकार कहने पर मैं प्रतिज्ञा करके उसके साथ उस बिल में घुसा और वहाँ जाकर
मैंने रत्नों से बना एक भवन देखा ॥२१७॥
तब उस भवन से निकलकर एक असुर-कन्या मुझे प्रेम से अन्दर ले गई और वहाँ पर
उसने मुझे एक खड्ग प्रदान किया ॥२१८॥
और कहा यह खड्ग सब सिद्धियों को देनेवाला तथा आकाश में गति प्रदान
करनेवाला है। भली भाँति इसकी रक्षा करना। ऐसा कहती हुई उसके साथ मैं वहीं
रहा ॥२१९॥
तदनन्तर, पाशुपत के साथ की गई प्रतिज्ञा स्मरण करके खड्ग हाथ में लिये हुए मैं
उस बिल से बाहर निकला और मैं अपने साथ उस पाशुपत को भी उस असुर-मन्दिर में
ले गया ॥२२०॥
उस मन्दिर में पहली असुर-कन्या के साथ मैं और दूसरी असुर-कन्या के साथ वह
पाशुपत रहने लगा ॥२२१॥
एक बार मद्यपान से मत्त पाशुपत ने मेरी बगल में रखे हुए खड्ग को अपने हाथ में
कर लिया। उस खड्ग के हाथ आते ही उस पाशुपत को महान् सिद्धि प्राप्त हुई और उसने मुझे
हाथ से पकड़कर उस बिल से बाहर फेंक दिया ॥२२२-२२३॥
तब मैं बारह वर्षों तक बिल के बाहर उसकी प्रतीक्षा करता हुआ बैठा रहा कि
कभी वह बाहर निकले और मैं उसे पकडूँ ॥२२४॥
सो वह दुष्ट आज मेरी ही असुर-कन्या के साथ क्रीड़ा करता हुआ दीख पड़ा है ॥२२५॥
हे देवि राजा त्रिभुवन जब मेरे साथ वार्तालाप कर ही रहा था कि इतने में ही मद्य के नशे
में विह्वल पाशुपत पुरुष सो गया ॥२२६॥
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