Skip to content
SarvaKosh
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

Page 710 of 1079

Read in context
Page 710

नवम लम्बक
१६५

वह महीपाल बन्धु-बान्धवों से सत्कृत होकर समस्त वृत्तान्त सुनानेवाले पिता के साथ
माता के पास कुछ दिनों तक रहा ॥१९७॥

उधर तारापुर में प्रातःकाल शयनागार में सोई हुई महीपाल की पत्नी बन्धुमती
उठी ॥१९८॥

और यह जानकर कि 'उसका पति कहीं चला गया है' विरह से व्याकुल होकर महल में
उद्यान में कहीं भी शान्ति नहीं प्राप्त कर सकी ॥१९९॥

आंसू की धार से हार को दुहरा भारवाला बना करके दिनरात रोती हुई और उसी
के नाम पर प्रलाप करती हुई वह मृत्यु में ही सुख मांगने लगी ॥२००॥

"मैं किसी कार्य से जा रहा हूँ शीघ्र ही आऊँगा' ऐसा मुझे गुप्त रूप से कहकर वह
महीपाल गया है, इसलिए बेटी सोच मत करो" ॥२०१॥

इस प्रकार धीरज देनेवाले मन्त्री अनन्तस्वामी की बातों से किसी प्रकार समझाने-बुझाने
पर वह धैर्य रख सकी ॥२०२॥

तब भी पति का समाचार जानने के लिए दूसरे देशों से आनेवाले ब्राह्मणों को वह सदा
सत्कार आदि से सन्तुष्ट करती थी ॥२०३॥

एक बार दान लेने के लिए आये हुए संगमदत्त नामक निर्धन ब्राह्मण से उसने चिह्न
और नाम बताकर पति का समाचार पूछा ॥२०४॥

तब वह ब्राह्मण उससे बोला कि मैंने ऐसा व्यक्ति कहीं देखा तो नहीं है, तो भी महारानी
तुम्हें अधीर न होना चाहिए ॥२०५॥

प्रिय का समागम शुभ कार्यों के कारण विलम्ब से ही होता है। इस सम्बन्ध में मैंने जो
आश्चर्य देखा है वह तुम्हें कहता हूँ सुनो ॥२०६॥

एक बार तीर्थ-यात्रा करता हुआ मैं हिमालय पर स्थित मानस-सरोवर में पहुँचा। वहाँ
पर मैंने मानो काँच से बने हुए मणि से रचित एक भवन को देखा ॥२०७॥

और देखा कि उस भवन से अकस्मात् ही निकलकर तलवार हाथ में लिये हुए एक
पुरुष दिव्य नारियों से युक्त होकर मानस-सर के तट पर गया और मद्यपान आदि करके
उन स्त्रियों के साथ क्रीड़ा करने लगा। मैं भी बड़े ही कौतुक से छिपकर उसे देख रहा था।
इतने में ही वहीं कहीं से दूसरा सुन्दर पुरुष आ निकला। उसके मिलने पर मैंने जो कुछ देखा
सो सब उसे सुनाया ॥२०८-२१०॥

और, उन स्त्रियों-सहित पुरुष को भी उसे दिखाया। वह देखकर उस पुरुष ने अपना
वृत्तान्त मुझे इस प्रकार सुनाया—॥२११॥