कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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वह चक्र भी माता-पिता को सब वृत्तान्त सुनाकर और बन्धु-बान्धवों को आनन्दित करके
अपने धर्म पर दृढ होकर रहने लगा ॥१६८॥
महीपाल को यह कथा सुनाकर कनकस्वामी ने फिर कहा-'माता-पिता के विरोध करने
का तो इतना दुष्परिणाम होता है और इनकी भक्ति भी इसी प्रकार कामधेनु है। इस सम्बन्ध
में भी कथा सुनो- ॥१६९-१७०॥
अहंकारी मुनि, पतिव्रता स्त्री और धर्मव्याध की कथा
प्राचीन काल में वन में रहनेवाला एक महातपस्वी मुनि था। एकबार वह वृक्ष की छाया
में बैठा था कि उसके सिर पर एक बगुली ने बीट कर दी तो मुनि ने क्रुद्ध होकर उसे
देखा ॥१७०-१७१॥
मुनि के इस प्रकार देखते ही वह बगुली जलकर भस्म हो गई। तब मुनि को अपने तप
पर अहंकार उत्पन्न होगया ॥१७२॥
एक बार वह मुनि भिक्षा के लिए नगर में एक ब्राह्मण के घर गया। वहाँ जाकर
उसने गृहिणी से भिक्षा माँगी ॥१७३॥
पतिव्रता गृहिणी ने कहा-'जरा ठहरो मैं पति की सेवा समाप्त कर लूँ,
तो भिक्षा दूँ ॥१७४॥
तब क्रोध-भरी दृष्टि से देखते हुए उस मुनि को देखकर वह पतिव्रता हँसकर बोली-
'मुनि मैं बगुली नहीं हूँ। प्रतीक्षा करो' ॥१७५॥
यह सुनकर वह मुनि आश्चर्य के साथ वहाँ बैठकर सोचने लगा कि इस स्त्री ने यह
कैसे जान लिया ? ॥१७६॥
तब वह पतिव्रता स्त्री पति की अग्निहोत्र-सम्बन्धी सेवा समाप्त करके और भिक्षा
लेकर मुनि के समीप आई ॥१७७॥
तब वह मुनि हाथ जोड़कर उस सती स्त्री से बोला-'माता तुमने अपने परोक्ष के इस
बगुली के वृत्तान्त को कैसे जान लिया ? ॥१७८॥
यह प्रारम्भ से कहो तो मैं भिक्षा ग्रहण करूँगा ? इस प्रकार कहते हुए मुनि से वह
पतिव्रता कहने लगी ॥१७९॥
मैं पति-भक्ति के सिवा और दूसरा धर्म नहीं जानती। अत उसी की कृपा से मुझे यह
विज्ञान-बल मिला है॥१८०॥
और यहाँ मांस बेचकर जीवन-निर्वाह करनेवाला एक धर्मव्याध है उससे जाकर मिलो।
इससे तुम्हें अहंकार-रहित कल्याण मिलेगा' ॥१८१॥
इस प्रकार उस सर्वज्ञ पतिव्रता से कहा गया वह मुनि भिक्षा लेकर और प्रणाम
करके वहाँ से निकला ॥१८२॥