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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ३५७
यह सुनकर उस दिन को मैंने बड़े दुःख के साथ बिताया और रात में स्वप्न के समान
आये हुए एक भयंकर पुरुष को देखा ॥१५३॥
उस पुरुष ने मुझे बलपूर्वक उठाया और इस लोहे की कोठरी में लाकर पटक दिया
और तब मेरे सिर पर इस घूमते हुए गरम चक्र को लगा दिया ॥१५४॥
इस प्रकार, यह मुझे मेरे माता-पिता का शाप है। मेरे प्राण ही नहीं निकल रहे हैं,
यद्यपि भयंकर वेदना हो रही है। शाप की अवधि का एक मास आज पूरा होगया फिर भी
मैं इस कष्ट से नहीं छूट रहा हूँ" ॥१५५॥
इस प्रकार कहते हुए लब्ध से दयालु चक्र बोला- धन के लिए द्वीपान्तर जाते हुए मैंने
माता-पिता की बात नहीं मानी थी तो उन्होंने शाप दिया था कि तेरा कमाया हुआ भी धन
नष्ट हो जायगा। इसी कारण द्वीपान्तर से कमाया हुआ मेरा सारा धन समुद्र में
डूब गया। ॥१५६-१५७॥
यही वृत्तान्त मेरा है। अब इस जीवन से क्या लाभ है। इस चक्र को मेरे सिर पर रख
दो। तुम्हारा शाप नष्ट हो' ॥१५८॥
वह जब इस प्रकार कह ही रहा था कि इतने में उसने आकाशवाणी सुनी कि 'हे
लब्ध तू छूट गया। इस चक्र को चक्र के सिर पर रख दे' ॥१५९॥
यह सुनकर अपने सिर से चक्र को चक्र के सिर पर रखकर, लब्ध किसी अदृश्य शक्ति
के द्वारा पिता के घर ले जाया गया ॥१६०॥
अब वह अपने घर में माता-पिता की आज्ञा का पालन करता हुआ रहने लगा। उधर
चक्र को सिर पर लेकर चक्र ने यह कहा- पृथ्वी पर और जो भी मेरे समान पापी हों
वे पाप से छूट जाँय जबतक पापों का नाश न हो तबतक यह चक्र मेरे सिर पर घूमता
रहे ॥१६१-१६२॥
इस प्रकार के धैर्यशाली चक्र पर आकाश से देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की और वे प्रसन्न
होकर बोले-॥१६३॥
'हे महापुरुष ठीक है ठीक है, तेरी इस अपार करुणा से तेरे पाप नष्ट हो गये।
अब जाओ तुम्हारे पास अक्षय धन होगा ॥१६४॥
देवताओं के इस प्रकार कहने पर चक्र के सिर से वह लोहे का जलता चक्र अदृश्य
हो गया ॥१६५॥
और, आकाश से उतरकर आये हुए एक विद्याधर ने इन्द्र द्वारा भेजे गये अमूल्य रत्नों का
ढेर उसे दिया ॥१६६॥
और, चक्र को पोत में उठाकर, उसे उसके धवलपुर में पहुँचाकर वह विद्याधर जैसे
आया था वैसे ही चला गया ॥१६७॥
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