कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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तुमको राजा हुए जानकर, उसने मुझे कैसे भुला दिया यह सोचकर चिरदुःखिता माता
क्रोध करके कभी तुम्हें शाप न दे दे ।।१३८।।
माता और पिता से शापित व्यक्ति कभी सुख नहीं पाता इस सम्बन्ध में एक पुरानी
कहानी कहता हूँ सुनो ।।१३९।।
चक्र और खड्ग नामक वैश्यपुत्रों की कथा
प्राचीन समय में चक्रपुर में चक्र नाम का एक वैश्य-पुत्र था। वह माता-पिता के द्वारा
मना किये जाने पर भी उनकी इच्छा के विरुद्ध व्यापार के लिए सुवर्णद्वीप चला गया ।।१४०।।
पाँच वर्षों में वहाँ से पर्याप्त द्रव्य उपार्जित करके लौटते हुए वह रत्नों से भरी नाव
पर चढ़ा ।।१४१।।
जब स्वदेश का किनारा कुछ ही शेष रह गया तब आकाश में सहसा आँधी-पानी की
बौछार के साथ भारी बादल-दल उमड़ पड़ा ।।१४२।।
यह माता-पिता की आज्ञा के विरुद्ध व्यापार करने क्यों गया मानों इसी क्रोध से
समुद्र की ऊँची-ऊँची तरंगों ने उसकी नाव को तोड़-फोड़ डाला ।।१४३।।
नाव में बैठे हुए अनेक व्यक्ति पानी में बह गये कितनों को मगर निगल गये और आयु
शेष रहने के कारण लहरों ने चक्र को किनारे पर ला पटका ।।१४४।।
किनारे पर बेहोश और असहाय पड़े हुए स्वप्न में जैसे उसने हाथ में फांस लिये हुए
एक भयंकर पुरुष को देखा ।।१४५।।
वह पुरुष चक्र को पाश से बाँधकर एक सभा में ले गया जहाँ दूर पर एक व्यथित सिंहासन
पर बैठा था ।।१४६।।
उसी सिंहासन पर बैठे हुए व्यक्ति की आज्ञा से पाशधारी पुरुष ने उसे एक लोहे की
कोठरी में पटक दिया ।।१४७।।
उस कोठरी के अन्दर चक्र ने सिर पर घूमते हुए लोहे के गरम चक्र से पीड़ित एक दूसरे
पुरुष को देखा ।।१४८।।
और पूछा—'तू कौन है तथा इस कष्ट से किस प्रकार तू जी रहा है? तब उसने
कहा—।।१४९।।
"मैं खड्ग नाम का वैश्यपुत्र हूँ। मैंने माता-पिता की बात नहीं मानी इससे क्रुद्ध होकर
उन्होंने मुझे शाप दिया कि तू सिर पर रखे हुए लोहे के चक्र के समान हम लोगों को त्रास देता है,
इसलिए हे दुराचारी तुझे भी ऐसी ही अनुपम पीड़ा होगी ।।१५०-१५१।।
ऐसा कहकर और रोते हुए मुझे देखकर वे बोले—'रोओ मत ऐसी पीड़ा तुझे केवल
एक मास तक ही होगी' ।।१५२।।