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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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Page 698

नवम लम्बक ६५१
दैवयोग से वे दोनों परस्पर अभिलाषा-युक्त हो गये और नारायणी देवी ने दोनों के भाव
को ताड़ लिया ॥१८॥
तदनन्तर, माताओं के साथ भैरव के चले जाने पर नारायणी कुछ विलम्ब करके वहीं रुक
गई और उसने वृक्ष पर बैठे हुए चन्द्रस्वामी को बुलाया ॥१९॥
नारायणी देवी ने वृक्ष से उतरकर आये हुए चन्द्रस्वामी तथा उस दासी दोनों से
पूछा कि क्या तुम दोनों को परस्पर मिलने की अभिलाषा है? ॥११०॥
'हाँ देवि है। ऐसा उन दोनों ने सत्य-सत्य कह दिया।' तब नारायणी देवी ने
क्रोध-रहित होकर चन्द्रस्वामी से कहा—'तुम लोगों ने सत्य कहा इसलिए शाप नहीं देती हूँ
वरन् तुझे यह दासी देती हूँ। तुम दोनों सुखी रहो' ॥१११-११२॥
यह सुनकर वह ब्राह्मण बोला— भगवती यद्यपि मैं चंचल मन को रोकता हूँ। किसी
परस्त्री का स्पर्श नहीं करता। यद्यपि चंचलता मन की प्रकृति है तथापि शारीरिक पाप से उसकी
रक्षा करनी चाहिए। इस प्रकार कहते हुए उस धीर ब्राह्मण से नारायणी देवी ने कहा—'बेटा
तुझ पर प्रसन्न हूँ और मेरा तो कहना है कि अपने बच्चों को प्राप्त कर और यह कभी न म्लान
होनेवाला कमल तुझे देती हूँ जो विष आदि को दूर करता है। इसे ले' ॥११३-११५॥
इस प्रकार कहकर और चन्द्रस्वामी को कमल देकर वह नारायणी देवी दासी
के साथ अन्तर्धान हो गई ॥११६॥
वह चन्द्रस्वामी देवी के दिये हुये कमल को पाकर और रात्रि के व्यतीत होने पर वहाँ
से चलकर घूमते-फिरते तारापुर नगर पहुँचा ॥११७॥
वहाँ पर उसका पुत्र महीपाल और कन्या राजा के ब्राह्मण-मन्त्री अनन्तस्वामी के यहाँ
ठहरे हुए थे ॥११८॥
इस नगर में जाकर वह चन्द्रस्वामी उसी मन्त्री के घर भोजन प्राप्त करने की इच्छा से गया
और उसे अतिथि-प्रिय जानकर उसके द्वार पर बैठकर वेदपाठ करने लगा। द्वारपालों द्वारा सूचना
देकर अन्दर ले जाये गये चन्द्रस्वामी को मन्त्री अनन्तस्वामी ने भोजन के लिए आमन्त्रित
किया ॥११९-१२०॥
वह निमन्त्रित चन्द्रस्वामी पाप हरण करनेवाले अनन्तह्रद नामक सरोवर में स्नान
करने के लिए गया ॥१२१॥
जब वह स्नान करके आया तब इतने में ही उसे 'हाय! हाय! बहुत दुख है' सारे
नगर में इस प्रकार का कोलाहल सुनाई पड़ा ॥१२२॥