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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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Page 694

नवम लम्बक ६४७
आज भैरव देव क्यों विलम्ब कर रहे हैं इस प्रकार माताओं ने नारायणी देवी से पूछा।
किन्तु वह हंसती थी कुछ बोलती न थी ॥७८॥
उन माताओं द्वारा अत्यन्त आग्रह के साथ पूछे जाने पर नारायणी ने कहा- 'यद्यपि यह
लज्जाजनक बात है फिर भी सहेलियों मैं तुमसे कहती हूँ' ॥७९॥
शूरपुर नगर में शूरसेन नाम का राजा है। सौन्दर्य में प्रसिद्ध उसकी विद्याधरी नाम की
कन्या है ॥८०॥
उसे देने की इच्छा करनेवाले राजा शूरसेन ने सुना कि उसके रूप के समान सुन्दर राजा
विमल का पुत्र प्रभाकर है ॥८१॥
राजा शूरसेन प्रभाकर को कन्या देना चाहता है यह राजा विमल ने भी सुना। और,
उस कन्या को अपने पुत्र के समान ही सुन्दर जानकर राजा विमल ने राजा सेनपुर में
दूत भेजकर, उसकी पुत्री विद्याधरी की अपने पुत्र प्रभाकर के लिए माँग की ॥८२-८३॥
शूरसेन ने भी आवश्यक सम्मति के साथ विमल के पुत्र प्रभाकर को विधिवूर्वक अपनी
कन्या प्रदान कर दी ॥८४॥
तब बहूरूपा विद्याधरी अपने श्वशुर के नगर विमलपुर में आकर अपने पति प्रभाकर
के साथ रात्रि में मिली ॥८५॥
वहाँ उत्कण्ठिता विद्याधरी ने जब पति प्रभाकर को बिना किसी चेष्टा के सोया
देखा तब उसने आश्चर्य से उसकी परीक्षा की और उसे नपुंसक पाया ॥८६॥
'हाय! हाय! मैं मारी गई, मुझे नपुंसक पति मिला' इस प्रकार सोचती हुई राजकुमारी
ने किसी प्रकार रात्रि व्यतीत की ॥८७॥
प्रातः काल ही उसने पत्र लिखकर अपने पिता के पास भेजा कि तुमने बिना जाँच किये
ही मुझे नपुंसक को कैसे दे दिया ॥८८॥
उस पत्र को पढ़कर राजा शूरसेन ने सोचा कि राजा विमल ने मुझे ठग लिया है। इसलिए
उसे क्रोध आ गया और उसने विमल के प्रति क्रोध प्रकट करते हुए उसे यह लिखित सन्देश भेजा
कि तूने छल से अपने नपुंसक लड़के के लिए जो मेरी पुत्री को बियाह दिया है अब उसका फल
भोगो। मैं सेना लेकर आता हूँ और तुझे मार डालता हूँ ॥८९॥
बल के मद से उन्मत्त शूरसेन ने राजा विमल के लिए इस प्रकार सन्देश भेज दिया। राजा
विमल भी इस सन्देश को पाकर मन्त्रियों के साथ उसके लेख का तत्त्व विचारने लगा क्योंकि
शूरसेन बल में विमल से अधिक होने के कारण उसके लिए अजेय था ॥९१-९२॥