Skip to content
SarvaKosh
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

Page 674 of 1079

Read in context
Page 674

नवम लम्बक १२७
यह जानकर वह अदृश्य भामिन उसके शरीर से बाहर निकल गई, क्योंकि शाप के भय
से स्त्रियाँ कुमार के गर्भगृह में प्रवेश नहीं करतीं ॥१७४॥
तब वह राजा कनकप्रभ भामिन के तेज से रहित होकर केवल अपने मानव-तेज के साथ
ही वह कार्तिकेय देवता के गर्भगृह में प्रविष्ट हुआ ॥१७५॥
कुमार ने भामिन के निकल जाने के कारण तेजोहीन राजा को देखकर सोचा कि यह
क्या बात है ॥१७६॥
और ध्यान लगाकर भामिन के बल से कठोर तपस्या में उत्तीर्ण हुए उसे जानकर
क्रोध में शाप दिया—॥१७७॥
'राजा तूने मेरे साथ कपट व्यवहार किया है। इसलिए तुझे उत्पन्न हुए बालक और
महारानी से भीषण वियोग होगा ॥१७८॥
वज्रपात के समान भयंकर शाप को सुनकर महाकवि राजा ने मोह त्याग कर सुन्दर-
सुन्दर सूक्तियों से स्वामी कार्तिकेय की स्तुति प्रारम्भ की ॥१७९॥
उसकी सूक्तियों से सन्तुष्ट होकर षण्मुख ने उससे कहा—'राजन्, तेरी सूक्तियों
से मैं प्रसन्न हुआ। अब तेरे उस शाप का अन्त करता हूँ ॥१८०॥
तुझ रानी और पुत्र का वियोग एक बार के लिए होगा। तू तीन बार अपमृत्यु से
बचकर उन्हें प्राप्त करेगा ॥१८१॥
कार्तिकेय स्वामी के ऐसा कहकर चुप हो जाने पर राजा उन्हें प्रणाम करके उनकी कृपा
से सन्तुष्ट होकर अपने नगर को गया ॥१८२॥
नगर में पहुँचने पर कुछ दिनों के उपरान्त चन्द्रमा की चाँदनी से अमृत-वर्षा के समान
मदनसुन्दरी से रत्न उत्पन्न हुआ ॥१८३॥
राजा और रानी पुत्र के मुख को देखकर अपने आनन्द में अपने में ही फूल न
समाये। उस राजा ने धन बरसाते हुए उसी समय महान् उत्सव किया और स्वर्ण की वर्षा
करके उसका कनकप्रभ नाम सार्थक किया ॥१८४-१८५॥
पाँच रात्रियों के बीतने पर छठी रात्रि में प्रसूति-भवन में सर्वतो रक्षा का प्रबन्ध करने पर
जो आयुष्मान् किया जाता है ही सब विध किया ॥१८६॥
धीरे-धीरे बढ़ते हुए बालक के कारण बाल्य योग्य विद्या जैसे प्रभावसे राजा के राज्य का
यशो रूप पात्र भर गया है ॥१८७॥
बाल-लीला दिखलाता हाथी, मस्ताना पन और चाल के समान मूसलाधार वृष्टि से वंशी
का उगाड़ना हुआ व न गया ।