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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ६७
वह राजा कनकवर्ष एक समय जब प्रकृति में कुछ ऊष्मा रहती है हाथी मदोन्मत्त
हो जाते हैं, राजहंसों के परिवार, अपनी प्रसन्नता से प्रजाजनों को आनन्दित करते रहते हैं ऐसे
अपने गुणों के समान गुणवाले शरत्काल में विहार करने के लिए चित्र-मण्डप में गया जो
कमल के पराग से सुगन्धित और शीतल वायु से रमणीय हो रहा था ।।३३-३४।।
उस चित्र-भवन में राजा जबतक एक चित्र को भली भाँति देखकर उसकी प्रशंसा कर
रहा था तबतक द्वारपाल ने आकर निवेदन किया— 'महाराज विदर्भ देश से एक चित्रकार यहाँ
आया है वह चित्रकला में अपने को अद्वितीय कुशल बताता है ।।३५ ३६।।
उस रोलदेव नामक चित्रकार ने राजभवन के द्वार पर चित्रपट में एक चित्र बनाकर
लटका रखा है।।३७।।
यह सुनकर राजा ने आदर के साथ उसे बुलाने के लिए आदेश दिया और द्वारपाल
भी क्षण-भर में उस चित्रकार को लेकर वहाँ उपस्थित हो गया ।।३८।।
उस चित्रकार ने चित्र-भवन में प्रवेश करके चित्रों को देखने के विनोद में लगे हुए
राजा कनकवर्ष को एकान्त में देखा ।।३९।।
तदनन्तर, सुन्दरी स्त्री के कुचों के बीच शरीर का भार दिये हुए, आसन पर बैठे हुए और
हाथ में पान का बीड़ा उठाये हुए राजा से उस चित्रकार रोलदेव ने नम्रतापूर्वक निवेदन
किया।।४०-४१।।
महाराज मैंने आपके चरण-कमलों के दर्शन के लिए राजद्वार पर एक चित्र लटका
रखा था न कि अपने कौशल के घमंड से। आप आज्ञा दें कि चित्र में किसका रूप अंकित
करूँ जिससे चित्रकला सीखने का मेरा यत्न सफल हो ।।४२ ४३।।
चित्रकार के ऐसा कहने पर राजा ने उससे कहा-हे उपाध्याय जो तुम्हारी इच्छा
हो लिखो। हमें तो अपनी आँखों को आनन्दित करना है। तुम्हारी कुशलता में सन्देह ही
क्या है। राजा के इस प्रकार कहने पर उनके समीप बैठे (दरबारी) लोग कहने लगे-'तुम राजा
का ही चित्र बनाओ। अन्य किसी विरूप का चित्र बनाने से क्या काम ? यह सुनकर सन्तुष्ट
चित्रकार ने पट पर राजा का चित्र बनाया ।।४४-४५।।