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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ६१
तदनन्तर शत्रुओं पर विजयी हुए राजा समरबल अपनी उस कंटक-रहित और समृद्धि-
सम्पन्न राज्य का चिरकाल तक शासन करता रहा और अप्सराओं से भी अधिक रूप-लावण्यवाली
विजय-पताका के समान यशोलेखा के साथ आनन्द भी उठाया ॥२३८॥
इस प्रकार, आवेग से प्रवृत्त द्वेष से व्याकुल और अपने-पराये स्वरूप को न जाननेवालों
और असाधारण पुरुषार्थ के आगे चूर-चूर घमंडवालों को नीचक और पुंश्चल जीत
लेता है ॥२३९॥
इस प्रकार गोमुख से कही गई यथार्थता से भरी कथा को सुनकर उसकी प्रशंसा
करता हुआ नरवाहनदत्त अपने स्नान आदि दैनिक कृत्यों में लग गया ॥२४०॥
नरवाहनदत्त ने अपनी सभी पत्नियों के साथ संगीत-रस का पान करते हुए उस रात को
भी बिताया। आकाश में गूँजती हुई उनकी स्वर-सरस्वती 'चिरजीवी हों' मानों ऐसा आशीर्वाद
देती थी ॥२४१॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के अलंकारवती लम्बक का
चौथा तरंग समाप्त
पञ्चम तरंग
मरुभूति की कथा
किसी एक दिन अलंकारवती के निवास-भवन में बैठे हुए नरवाहनदत्त के पास सभी
मन्त्रियों की उपस्थिति में आकर मरुभूति के सेवक ने निवेदन किया। वह सेवक राजा के
रनिवास के रक्षक कंचुकी का सहोदर भाई था ॥१-२॥
उसने कहा- महाराज मैंने दो वर्षों तक मरुभूति की सेवा की और इसने उन दो वर्षों
तक तात्त्विक मुझे भोजन-वस्त्र दिया ॥३॥
इसने कहा था कि प्रतिवर्ष तुम पचास दीनार (सोने की मुहरें) दिया करूँगा किन्तु
इसने वे मुझे नहीं दिये ॥४॥
मेरे माँगने पर इसने मुझे पैरों से ठोकर मारी इसलिए मैं आपके सिंहद्वार पर अनशन
करने के लिए बैठा हूँ। यदि आप मेरा विचार न करेंगे तो मैं अग्नि प्रवेश करूँगा क्योंकि यह
मेरा स्वामी है ॥५-६॥
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