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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ५९३
तब यशोवर्मा ने स्वप्न में देखा कि हाथों में डंडे लिए हुए कुछ भयंकर पुरुष बिना भय
और शंका के वहाँ घुस आये ॥१७९॥
'तूने आज एक तोला घी अधिक क्यों खाया मांस-रस के साथ भात अधिक क्यों खाया
और दूध भी एक कटोरा अधिक क्यों पिया ?' क्रोध से ऐसा कहते हुए उन पुरुषों ने अर्थवर्मा को
डंडों से खूब पीटा ॥१८०-१८१॥
और, उसने जो मांसरस भात और दूध अधिक खा लिया था उसे उन्होंने उसके पेट
से निकाल लिया ॥१८२॥
स्वप्न में यह देखकर जगे हुए यशोवर्मा ने देखा कि अर्थवर्मा पेट के शूल से
व्याकुल है ॥१८३॥
वेदना से चिल्लाता हुआ और सेवकों द्वारा पेट दबाया जाता हुआ अर्थवर्मा अपने
अधिक खाये हुए को वमन करने लगा। उसका शूल शान्त होने पर, यशोवर्मा सोचने लगा
कि इस अर्थलक्ष्मी को धिक्कार है जिसका इस प्रकार का भोग है ॥१८४-१८५॥
यदि वैश्य लक्ष्मी से ऐसे तंग किया जाता है, तो ऐसी लक्ष्मी से दरिद्र रहना ही अच्छा है,
मन में इस प्रकार सोचते हुए उसने वह रात्रि व्यतीत की ॥१८६॥
प्रातःकाल यशोवर्मा अर्थवर्मा से मिलकर वहाँ से भोगवर्मा के घर पर गया ॥१८७॥
वहाँ भी भोगवर्मा द्वारा समुचित सत्कार किया गया यशोवर्मा भोगवर्मा से भोजन के
लिए निमन्त्रित हुआ ॥१८८॥
उसने उस वैश्य के यहाँ किसी प्रकार की सम्पत्ति का आडम्बर नहीं देखा। केवल सुन्दर
स्वच्छ भवन अच्छे वस्त्र और आभूषण मात्र देखे ॥१८९॥
तदनन्तर, यशोवर्मा की उपस्थिति में ही भोगवर्मा ने अपना दैनिक व्यापार¹
प्रारम्भ किया ॥१९०॥
एक से माल खरीदकर उसी समय उसने दूसरे को बेचिया और अपना धन बिना लगाये
ही बीच में (दलाली से) दीनार कमा लिया ॥१९१॥
और, शीघ्र ही उन स्वर्ण-मुद्राओं को नौकर के हाथ अपनी स्त्री के पास भेजकर अच्छा
भोजन बनाने के लिए निर्देश दिया ॥१९२॥
१ आढ़त का काम।
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