कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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यह सुनकर यशोधर्मा ने देवी से कहा—'मैं इन दोनों लक्ष्मियों का भेद भली भाँति नहीं
जानता' ॥१६४॥
तब देवी ने उससे कहा—'तेरे देश में जो दो बनिये भोगवर्मा और अर्थवर्मा हैं जाकर
उनकी लक्ष्मी को देखो और बताओ कि तुम्हें किसके समान लक्ष्मी चाहिए। उसे मेरे
पास आकर माँगो' ॥१६५-१६६॥
यह सुनकर और जागकर प्रातःकाल पारण करके यशोधर्मा अपने देश कौतुकपुर
को गया ॥१६७॥
अर्थवर्मा और भोगवर्मा बनिये की कथा
पहले वह अर्थवर्मा के घर पर गया जिसने असंख्य सोना और रत्नों का ढेर प्राप्त
किया था। उसकी इस सम्पत्ति को देखता हुआ यशोधर्मा उसके पास गया। अर्थवर्मा ने उसका
आतिथ्य-सत्कार करके उसे भोजन के लिए निमन्त्रण दिया ॥१६८-१६९॥
तब यशोधर्मा ने अर्थवर्मा के यहाँ भी भात, व्यञ्जन आदिका अतिथिके भोजन के लिए
उचित न पाये ॥१७० ॥
अर्थवर्मा ने दो तोला घी में सने हुए सत्तू, थोड़ा-सा भात और अत्यल्प मांस का व्यंजन
खाया ॥१७१॥
यह देखकर यशोधर्मा ने अर्थवर्मा से आश्चर्यपूर्वक पूछा—'हे व्यापारी, क्या तुम इतना
ही भोजन करते हो'? तब बनिया ने कहा—'आज मैंने तुम्हारे कारण थोड़ा-सा मांस का
व्यंजन खा लिया और दो तोला घी भी सत्तू के साथ खा लिया ॥१७२-१७३॥
सदा तो मैं एक कर्ष-मात्र घी सत्तू के साथ खाया करता हूँ। इससे अधिक मुझ
मन्द निवाले को पचता नहीं ॥१७४॥
यह सुनकर अर्थवर्मा से सम्बद्ध करता हुआ उसकी निन्दा की और उसकी लक्ष्मी को व्यर्थ
समझा ॥१७५॥
तदनन्तर, रात्रि के समय अर्थवर्मा ने यशोधर्मा के लिए दूध और भात मँगवाया।
यशोधर्मा ने डटकर भोजन किया किन्तु अर्थवर्मा ने तब छटाँक भर दूध पिया ॥१७६-१७७॥
भोजन के पश्चात् वे दोनों (अर्थवर्मा और यशोधर्मा) बिस्तर बिछाकर पास ही पास
सो गये ॥१७८॥