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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ५७७
इस प्रकार कहकर उनसे बिदा किया हुआ नरवाहनदत्त इन्द्र के रथ को लेकर आये हुए
सारथी मातलि से बोला-'उस दिव्य सरोवर के समीप जहाँ गोमुख आदि ठहरे हैं चलकर उसी
मार्ग से मुझे कौशाम्बी पहुँचाओ' ॥६३-६४॥
'वैसा ही करूँगा'-मातलि से ऐसा कहा गया वह नरवाहनदत्त अप्सराओं के साथ
रथपर चढ़कर उस सरोवर पर पहुँचा और वहाँ गोमुख प्रलम्बबाहु आदि को उसने
देखा ॥६५॥
और उनसे बोला-'आप लोग अपने ही मार्ग से जाओ। घर पर सब कुछ कहूँगा -
ऐसा कहकर वह इन्द्र के रथ से कौशाम्बी चला गया ॥६६॥
वहाँ पर आकाश से उतरकर और मातलि को सत्कार के साथ विदा करके अप्सराओं
के साथ वह अपने महल में गया ॥६७॥
उन अप्सराओं को वहीं ठहराकर वह उसके आगमन से प्रसन्न अपने पिता वत्सराज के
पास गया और उसके चरणों की वन्दना की ॥६८॥
इसी प्रकार उसने माता वासवदत्ता और पद्मावती के चरणों में प्रणाम किया।
दर्शन से अतृप्त आँखों से उसे देखकर माताओं ने उसे आशीर्वाद दिया ॥६९॥
इतने में ही गोमुख भी रथ पर चढ़ा हुआ सारथी और प्रलम्बबाहु नामक उस ब्राह्मण
के साथ वहाँ आ पहुँचा ॥७०॥
तदनन्तर सभी मन्त्रियों के आ जाने पर पिता द्वारा पूछे गये नरवाहनदत्त ने अपना
अत्यन्त आश्चर्यमय यात्रा-वृत्तान्त उन्हें सुनाया ॥७१॥
ईश्वर, जिस पुण्यकर्मा पर कृपा करता है, उसे अच्छे और कल्याणकारी मित्रों का
संयोग कराता है ॥७२॥
सब लोगों के ऐसा कहने पर वत्सराज ने अपने पुत्र पर भगवान् विष्णु की कृपा का महोत्सव
मनाया ॥७३॥
तब राजा (वत्सराज) ने विष्णु की कृपा से प्राप्त उन नई वधुओं (अप्सराओं) को
देखा जिन्हें राजा और रानी के चरणों की वन्दना करने के लिए गोमुख वहाँ लाया था ॥७४॥
सासियों द्वारा नाम पूछने पर उन चारों ने अपने नाम देवरूपा देवरति देवमाला और
देवप्रिया बतलाया ॥७५॥
उस समय वायु से हिलती हुई लाल पताकाओं से उत्सव मनाती हुई कौशाम्बी- 'मैं
कहाँ और अप्सराएँ कहाँ ? नरवाहनदत्त ने तो पृथ्वी पर मुझे स्वर्ग की नगरी के समान
बना दिया-इस प्रसन्नता से मानों सिन्दूर उड़ाती थी ॥७६-७७॥
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