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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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Page 610

नवम लम्बक ५६३
तथा हमारे राजा का कल्याण हो! इस प्रकार कहकर उठती हुई वह ज्वालामालावाली
चिता में ठंढे ह्रद में जैसे प्रविष्ट हुई ॥१६०॥
छिपे-छिपे राजा विक्रमत्तुंग यह सब दृश्य देखकर, 'मैं इससे कैसे उऋण होऊँगा' इसी
चिन्ता में मग्न होगया ॥१६१॥
तब धीरचित्त वीरवर ने भी सोचा-'मेरे स्वामी का कार्य साधा गया। दिव्य वाणी भी
सुन ली। राजा के अन्न का बदला अपने पालनीय और प्यारे कुटुंब के बलिदान से चुका
दिया॥१६२-१६३॥
अब केवल अपना पेट भरने के लिए जीवन का रखना अच्छा नहीं। तो क्यों न मैं भी
अपने को भगवती चण्डिका को उपहार बनाकर पूजन करूँ ॥१६४॥
सात्त्विक वीरवर ने इस प्रकार निश्चय करके करणाविनी देवी की इस प्रकार स्तुति
प्रारम्भ की-॥१६५॥
'हे प्रणत जनों को आश्रय देनेवाली माहेश्वरी! तुझे प्रणाम है। संसार के पंक
में फँसे हुए मुझ शरणागत का उद्धार करो ॥१६६॥
तू समस्त प्राणियों की प्राणशक्ति है। तेरे ही कारण यह सारा संसार जीवित है।
सृष्टि के प्रारम्भ में तू ही पहले उत्पन्न हुई थी। तुझे शिव ने हृदय में रखा। तू विश्व को उत्पन्न
करके अपने प्रवर तेज से ऊर्ध्व और अधोमय में उत्पन्ननवीन परमाणु मूर्ती की पंक्ति के समान
प्रादुर्भूत हुई ॥१६७-१६८॥
तू ने सह्य गन्ध धनुष और शृंग आदि पार्वत्य कन्दराओं भुवनतल से आकाश को
उठा लिया ॥१६९॥
इस प्रकार नानाविध नाना स्तुति की है। 'पाहि' 'हे चामरे' 'हे शंभवे' 'हे त्रिपुरे!
हे जय! तुझे प्रणाम करता हूँ। तू एक भवरहित शिखा दुर्गा नारायणी सरस्वती भद्रकाली
महालक्ष्मी विद्या और इड़ा न का नाश करनेवाली' ॥१७०-१७१॥
तू ही लक्ष्मी महासती रेवती चित्रशालिनी उषा कात्यायनी और उत्तरकुरु की
विहंगिनी है १७२।
हे देवि, इन नामों वाली स्मरण करने पर स्त्रियों का गन्दर्भ समान बलिष्ठ और
षष्ठादि दोष से नेहरी हुई १७३-१७४॥
मैं इसलिए तुझे दण्डवत् बलि और पूजन अर्चन करता हूँ सो अधिक फल प्राप्त कर
चुके और करके ॥१७५॥