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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ५५५
तब जब कि मेघ भीषण धारा-रूपी बाण-वर्षा कर रहा था वह बीरबर राजा के सिंह
द्वार पर खम्भे के समान अविचल भाव से खड़ा रहा ॥१२॥
राजा विक्रमतुंग अपने महल की खिड़की से उसे प्रतिदिन पहरा देते हुए देखकर शयन-
गृह में चढ़ता था ॥१३॥
एक बार, राजा ने घोर वर्षा के समय ऊपर से कहा— 'यहाँ कौन है ? यह सुनकर
बीरबर ने उत्तर दिया—'मैं बीरबर उपस्थित हूँ।' ॥१४॥
आश्चर्य है कि यह महान् बलशाली व्यक्ति है जो ऐसी घोर वृष्टि में भी सिंहद्वार
को नहीं छोड़ता ॥१५॥
उसका उत्तर सुनकर राजा जब यह सोच ही रहा था कि इतने में ही उसने दूर से किसी
स्त्री को करुण स्वर में रोते हुए सुना ॥१६॥
'मेरे राज्य में कोई भी दुःखी नहीं है फिर यह कौन रो रही है ? —ऐसा सोचकर राजा ने
उसी समय बीरबर से कहा-'बीरबर, दूसरे स्थान पर कोई स्त्री रो रही है सुनो। यह कौन है और
इसे क्या दुःख है यह वहाँ जाकर पता लगाओ' ॥१७-१८॥
यह सुनकर और 'जो आज्ञा'— कहकर वह वहाँ जाने के लिए तैयार हुआ। उसकी कमर
में खंजर बँधा हुआ था और तलवार को हाथ से सम्भाले रहा था ॥१ ९॥
चमकती हुई बिजलीवाले भीषण मेघ के मूसलाधार वृष्टि के कारण उस समय आकाश
और पृथ्वी के एक होने पर भी बीरबर को उधर जाते हुए देखकर दयालु राजा भी महल से उतर
कर और तलवार हाथ में लेकर छिपे-छिपे उसके पीछे-पीछे चला ॥११०-१११॥
छिपकर राजा जिसका पीछा कर रहा था रोने के शब्द को लक्ष्य करके जाते हुए उस
बीरबर ने नगर के बाहर एक तालाब देखा ॥११२॥
उस सरोवर में उस स्त्री को उसने देखा जो यह कहती हुई रो रही थी- हाय नाथ !
हे दयालो ! हे शूर ! तुमसे परित्यक्ता होकर मैं कैसे जिऊँगी ॥११३॥
'तू कौन है और किस पति को छोड़कर विलाप कर रही है ? इस प्रकार बीरबर के पूछने
पर वह स्त्री कहने लगी— "बेटा बीरबर, मैं पृथ्वी हूँ। मेरा पति धार्मिक राजा विक्रमतुंग है।
आज से तीसरे दिन उसकी अवश्य मृत्यु होगी। इसलिए, सोच कर रही हूँ कि ऐसा पति
फिर मुझे कहाँ मिलेगा ? इस प्रकार, मैं अत्यन्त दुःखी होकर अपने को ही सोच
रही हूँ। ॥११४-११६॥