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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ५४५
इस प्रकार, जंगली पशुओं का शिकार कर राजा अपने नगर में लौट आया और वह
भिखारी भी पूर्ववत् सिंहद्वार पर आकर टिक गया ॥१९॥
एक बार, सीमान्तवर्ती एक राजा को जीतने के लिए राजा रूपदत्त गया। वहाँ
दोनों में घमसान युद्ध हुआ। उस युद्ध में राजा रूपदत्त के सामने ही उस भिखारी ने मजबूत
खैरा के डंडे के प्रहार से अनेक शत्रुओं को मार डाला। इस प्रकार, शत्रुओं को जीतकर राजा
अपने नगर लौट आया किन्तु दरिद्र भिखारी के अद्भुत पराक्रम को देखकर भी राजा ने उसे
कुछ नहीं दिया ॥२०-२२॥
इस प्रकार, निरन्तर राजद्वार पर रहते हुए और ककड़ियाँ चबाकर अपना जीवन व्यतीत
करते हुए उसे पाँच वर्ष बीत गये ॥२३॥
छठा वर्ष प्रारम्भ होने पर दैवयोग से एक बार उसे देखकर राजा रूपदत्त को दया उत्पन्न
हुई और उसने सोचा - ॥२४॥
बहुत दिनों से कष्ट पाते हुए इसको मैंने आज तक कुछ भी नहीं दिया। तो इसे
किसी युक्ति से कुछ देकर क्यों न देखूँ ॥२५॥
कि इस बेचारे के पापों का नाश हुआ या नहीं। अब भी लक्ष्मी इसे दर्शन देती है या
नहीं ॥२६॥
ऐसा सोचकर राजा अपने कोषागार में गया वहाँ से उसने एक बिजौरा नींबू में रत्न
भरकर के एक डिब्बे के समान उसे बन्द किया ॥२७॥
और, महल के बाहर उसने एक सार्वजनिक दरबार किया। उस दरबार में सभी
नागरिक सामन्त और मन्त्री एकत्र हुए ॥२८॥
उन लोगों में आये हुए उस कार्पटिक को राजा ने स्नेह-भरी वाणी से कहा-'यहाँ
निकट आओ' ॥२९॥
यह सुनकर लब्धदत्त कार्पटिक प्रसन्न हुआ और राजा के पास आकर उसके आगे बैठ
गया ॥३०॥
तब राजा ने उससे कुछ सुभाषित सुनाने के लिए कहा। राजा के यह कहने पर कार्पटिक ने
एक आर्या पढ़ी (जिसका अर्थ है-) ॥३१॥
'जिस प्रकार नदियों का समूह जल से भरे समुद्र को ही भरता है (और, तालाब आदि
सूखे ही रहते हैं) उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी भरे हुए (धनवान्) को ही भरती है और निर्धन
की आँखों के सामने भी नहीं आती' ॥३२॥
यह सुनकर और इस आर्या को फिर से उससे पढ़वाकर राजा ने प्रसन्न होकर रत्न से
भरा हुआ एक बिजौरा नींबू जो डिब्बे के समान उस ने दिया ॥३३॥