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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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Page 578

नवम लम्बक ५३१
उस दुराचारिणी स्त्री से क्या करोगे ? आओ, नन्दन उद्यान में हमारा उपभोग करो।—
मानो यह कहती हुई दिव्योगनाएँ आकर उसे (विजयवर्मा को) स्वर्ग ले गईं ॥३६१॥
वह अनंगप्रभा भी उस राजा के पास वैसे ही स्थिर हो गई, जैसे नदी सागर में आकर
स्थिर हो जाती है ॥३६२॥
अनंगप्रभा से पतिसङ्गम के कारण उस पति (सागरवर्मा) से अपने को कृतार्थ समझा और
राजा ने भी ऐसी सुन्दरी पत्नी पाकर अपना जन्म सफल समझा ॥३६३॥
कुछ दिनों पश्चात् सागरवर्मा की उस रानी ने राजा से गर्भ धारण किया और यथा
समय पुत्र को जन्म दिया ॥३६४॥
पिता राजा ने उस बालक का नाम समुद्रवर्मा रखा और उदारता के साथ पुत्रजन्म
का महोत्सव मनाया ॥३६५॥
क्रमशः बड़े हुए गुणवान्, युवा और बलशाली समुद्रवर्मा का राजा ने युवराज-पद पर
अभिषिक्त कर दिया ॥३६६॥
तदनन्तर उस समुद्रवर्मा के विवाह के लिए राजा ने समरवर्मा राजा की कमलमती नामक
कन्या की माँग की ॥३६७॥
और विवाहित युवराज का उत्तर गुणों से आकृष्ट राजा सागरवर्मा ने अपना समस्त
राज्य दे डाला ॥३६८॥
नीतिज्ञी और क्षत्रिय-धर्म का जाननेवाले समुद्रवर्मा ने भी पिता से राज्य लेकर उसे
प्रणाम करते हुए निवेदन किया—॥३६९॥
'हे पिता, मुझे आज्ञा दीजिए। मैं दिशाओं को जीतने के लिए जाता हूँ, क्योंकि पृथ्वी को
जीतने की इच्छा न करनेवाला राजा पृथ्वी का वैसे ही प्रिय नहीं होता, जैसे स्त्री को नपुंसक
पति ॥३७०॥
राजा की वही राजलक्ष्मी धर्मशीला और कीर्तिदायिनी होती है, जो शत्रुओं को जीतकर
अपनी भुजाओं के बल से प्राप्त की जाती है ॥३७१॥
हे पिता, इस तरह दिशाओं का राज्य पाकर शास्त्रार्थ-चिन्तन के समान अपनी उन्नति
के लिए अच्छी ही प्रज्ञा का मान रखिये ? ॥३७२॥
राजा यह सुन पुत्र के मन्त्रिगणों ने कहा—'हे महाराज, युवराज अभी युवा हैं। अतः
इनका कहना ही ठीक होगा। धर्म से प्रजाओं का पालन करनेवाला राजा कभी कहीं पराजित
नहीं होता। सभी दक्षिण और उत्तरों को जिन-सब-प्रजा समस्त राजाओं पर विजय प्राप्त
करें' ॥ (३७३-३७४ ॥)
इस पर पिता ने 'तथास्तु' कहा और तब युवराज ने राजा की अनुमति पाकर दिग्विजय का निश्चय
कर शीघ्र ही उस पर विजय प्राप्त करने की तैयारी आरम्भ कर दी ॥३७५॥