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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ५९
वह हाथ में खड्ग लेकर आकाश में उड़ा और समस्त हिमालय में घूमकर वीरपुर में
रहनेवाले विद्याधरों के राजा समर को प्राप्त किया ॥१८६॥
युद्ध में जीते हुए समर द्वारा प्रदत्त अनंगप्रभा को प्राप्त कर जीवदत्त दिव्य सम्पत्ति का
उपभोग करने लगा ॥१८७॥
तदनन्तर, कुछ दिनों तक वहीं रहने के पश्चात् उसने एक दिन अपने श्वशुर समर और
पत्नी अनंगप्रभा से कहा- 'हम दोनों (जीवदत्त और अनंगप्रभा) मनुष्य-लोक जाते। वहाँ जाने
के लिए मैं उत्सुक हो रहा हूँ। प्राणियों को अपनी जन्म-भूमि निकृष्ट होने पर भी बहुत प्यारी
लगती है ॥१८८-१८९॥
उसकी यह बात श्वशुर ने मान ली लेकिन भविष्य को समझती हुई अनंगप्रभा ने कठिनाई
से इसे माना ॥१९०॥
तदनन्तर जीवदत्त अनंगप्रभा को गोद में लिये हुए मर्त्यलोक में उतरा। मार्ग में
एक रमणीय पर्वत को देखकर अनंगप्रभा ने उससे कहा- 'मैं श्रान्त हो गई हूँ अतः इस पर्वत पर
विश्राम करो' ॥१९१-१९२॥
'ऐसा ही हो' इस प्रकार कहकर जीवदत्त उसके साथ उस पर्वत पर उतर गया और
अनंगप्रभा की विद्याओं के प्रभाव से भोजन-पान आदि किया ॥१९३॥
तब दैव से प्रेरित जीवदत्त अनंगप्रभा से बोला--'प्यारी कुछ मधुर संगीत
सुनाओ' ॥१९४॥
यह सुनकर अनंगप्रभा भक्ति से शिव की स्तुति गाने लगी। तब उसके गान के मधुर
शब्द से वह जीवदत्त ब्राह्मण धीरे-धीरे निद्रामग्न हो गया ॥१९५॥
तबतक हरिवर नाम का राजा शिकार खेलता हुआ और झरने का जल ढूँढ़ता हुआ उस
मार्ग से जा निकला ॥१९६॥
वह राजा हिरण के समान अनंगप्रभा के गीत से खिंचा हुआ रथ को छोड़कर वहाँ
आ गया ॥१९७॥
अच्छे शकुनों से पहले ही शुभ सूचना प्राप्त राजा ने वहाँ कामदेव की शान्ति के समान
सुन्दरी अनंगप्रभा को देखा ॥१९८॥
उसे देखते ही उसके गान और रूप से विवश राजा के हृदय को कामदेव ने बाणों से
बींध दिया ॥१९९॥