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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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पंचम लम्बक ४११
तब हठशर्मा ने धन के मद में आकर उसके घर में भी एक रात्रि को आग लगा दी।
उसके बाद मैंने दूसरे धनी क्षत्रियकुमार का आश्रय लिया ॥४०॥
तत्पश्चात् हठशर्मा ने आग लगाकर उसका घर भी फूँक डाला। तब उसने भी मुझे
छोड़ दिया और मैं मारी-मारी फिरने लगी ॥४१॥
शियार से डरती हुई भेड़ के समान मुझे मारने की इच्छा से मेरा पीछा करते हुए
हठशर्मा से मैं दूर-दूर भागती रही ॥४२॥
तब भागते-भागते मैंने इसी राजभवन में घर-सामग्रियों की रक्षा करनेवाले आपके बलवान्
सेवक वीरशर्मा का आश्रय लिया और उसकी दासी होना स्वीकार किया ॥४३॥
यह जानकर निराशा से पागल और विरह से व्याकुल हठशर्मा के शरीर में केवल
हाड़-मांस ही शेष रह गया ॥४४॥
उसके यहाँ आने पर मेरी रक्षा के लिए हठशर्मा को बाँधने को उद्यत वीरशर्मा को
मैंने मना कर दिया ॥४५॥
आज अकस्मात् मुझे बाहर निकली हुई देखकर हठशर्मा छुरा लेकर मुझे मारने के लिए
दौड़ा ॥४६॥
इसलिए, भागती हुई मैं यहाँ आई हूँ। दयालु प्रतीहारी ने मेरे लिए दरवाजा खोल
दिया और मैं आपके समीप आई; मैं समझती हूँ अभी वह बाहर खड़ा है ॥४७॥"
उसके ऐसा कहने पर नरवाहनदत्त ने उस ब्राह्मण हठशर्मा को अपने सामने
बुलवाया ॥४८॥
क्रोध के कारण लाल आँखों से अशोकमाला को देखते हुए, क्रोध से काँपते हुए अंगोंवाले
और हाथ में छुरा लिये हुए उस भीषण आकृतिवाले हठशर्मा से नरवाहनदत्त ने
कहा- ॥४९॥
'हे दुष्ट ब्राह्मण ! स्त्री को क्यों मारते हो और उसके लिए दूसरों के घरों में आग क्यों
लगाते फिरते हो ? तुम ऐसा पाप कार्य क्यों कर रहे हो? ॥५०॥
यह सुनकर वह ब्राह्मण कहने लगा-'यह मेरी धर्मपत्नी है और मुझे त्याग कर दूसरों के
पास चली गई, तो भला मैं कैसे सहन कर सकता'? ॥५१॥
उसके ऐसा कहने पर घबराई हुई अशोकमाला बोली- 'हे लोकपालो, यह तुम्हीं कहो
कि क्या तुम्हारी सन्निधि में इस ब्राह्मण ने मुझे हठपूर्वक विवाहित नहीं किया ? और, क्या मेरे
न चाहते हुए भी यह मुझे बलात् नहीं ले गया ? क्या उस समय मैंने यह नहीं कहा था कि मैं तेरे
घर न रहूँगी ? ॥५२-५३॥
अशोकमाला के इस प्रकार कहने पर दिव्यवाणी हुई-'यह अशोकमाला जो कहती है,
वह सच है ॥५४॥
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