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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ४८१
इतने में ही सोने और रत्नों के भार उठाए हुए हजारों दूसरे विद्याधर भी आकाश से
उतरे ॥२१३॥
यह सब समाचार जानकर राजा उदयन मन्त्रियो और महारानियों के साथ वहाँ आया
और पुत्र की उन्नति से अत्यन्त हर्षित हुआ ॥२१४॥
वत्सेश्वर द्वारा यथोचित आतिथ्य-सत्कार आदि करने पर स्नेह से झुके हुए राजा
अलङ्कारशील ने वत्सराज उदयन से कहा—॥२१५॥
'हे राजन्, यह अलङ्कारवती नाम की मेरी कन्या है। जिसके उत्पन्न होते ही आकाश
वाणी ने आदेश दिया था कि 'यह तुम्हारे पुत्र और विद्याधरों के भावी चक्रवर्ती नरवाहनदत्त की
पत्नी बनेगी' ॥२१६-२१७॥
अत मैं इसे नरवाहनदत्त के लिए देता हूँ। आज इन दोनों (वर-वधू) का शुभ लग्न है।
इसलिए, मैं अपने परिवार के साथ यहाँ आया हूँ ॥२१८॥
वत्सेश्वर उदयन ने विद्याधरों के राजा अलङ्कारशील की इन बातों को सुनकर 'यह
आपकी बड़ी कृपा है' ऐसा कहते हुए उसकी बातों का अभिनन्दन किया ॥२१९॥
तदनन्तर, अपनी विद्या के प्रभाव से उत्पन्न किये जल से उस विद्याधरराज ने आँगन की
भूमि को सींचा और वहाँ पर दिव्य वस्त्र से ढकी हुई सोने की वेदी निकल आई। और वह
आँगन विविध प्रकार के रत्नों से जड़ा हुआ एक (स्वाभाविक) कौतुकागार-सा बन
गया ॥२२०-२२१॥
तब राजा अलङ्कारशील ने नरवाहनदत्त से कहा—'उठो लग्न का समय हो गया।'
तदनन्तर स्नान किये हुए तथा मंगलमय विवाह-वेष धारण किये हुए नरवाहनदत्त का वेदी में
लाकर, प्रसन्न अलङ्कारशील ने, अपनी कन्या उसे प्रदान की ॥२२२-२२३॥
कन्या-हस्त के समय पुत्र-सहित अलङ्कारशील ने अलङ्कारवती के साथ मणि रत्न
सोना वस्त्र भूषण आदि के हजारों भार और अनेक दिव्य नारियां (दासियाँ) दीं ॥२२४॥
विवाह-कार्य सम्पन्न होने पर, अन्य सभी सम्बन्धियों को सम्मानित करके और उनसे
विदा लेकर अलङ्कारशील अपनी पत्नी और पुत्र के साथ जैसे आया था उसी प्रकार (आकाश
मार्ग) से चला गया ॥२२५॥
तदनन्तर, नम्र होते हुए विद्याधर राजाओं से सम्मानित किये जाते हुए पुत्र नरवाहनदत्त
की उन्नति को देखकर अत्यन्त प्रसन्न राजा उदयन ने बहुत काल तक विवाह-उत्सव
मनाया ॥२२६॥
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