कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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सौन्दर्य-सुधामयी उस रूपलता को नेत्रों से पान करता हुआ राजा पृथ्वीरूप उसी प्रकार
अतृप्त रहा जैसे अधिकाधिक चन्द्रिका का पान कर लेने पर भी चकोर अतृप्त ही रह
जाता है ॥१५४॥
और वह चित्रकार से बोला-'मित्र इसे बनानेवाले ब्रह्मा और इसे चित्र में उल्लेख
करनेवाले तुम दोनों के हाथ वन्दनीय हैं जिसने इस रूप का निर्माण किया और जिसने इसे चित्रपट
पर चित्रित किया ॥१५५॥
अतः मैं रूपधर राजा की बात को स्वीकार करता हूँ। मुक्तिपुर द्वीप को जाकर
उसकी कन्या को विवाहित करता हूँ ॥१५६॥
इतना कहकर भिक्षु तथा दूत को धन आदि से पुरस्कृत करके वह चित्रपट में रूपलता को
देखता हुआ बैठा रहा ॥१५७॥
और, अपने उद्यानों में भ्रमण करके उस विरही राजा ने उस दिन को किसी प्रकार व्यतीत
किया। तदनन्तर, लग्न आदि का निश्चय कराकर दूसरे ही दिन राजा ने बरात-सहित मुक्ति
पुर द्वीप की ओर प्रस्थान किया ॥१५८॥
राजा की बरात में हाथी घोड़े सामन्त राजा राजकुमार, राजा रूपधर का चित्रकार
और वे दोनों भिक्षु आदि सभी सम्मिलित थे ॥१५९॥
राजा स्वयं मंगलघट नामक हाथी पर चढ़कर क्रमशः जाता हुआ कुछ दिनों में विन्ध्या-
टवी के द्वार पर आकर ठहर गया ॥१६०॥
दूसरे दिन वह राजा पृथ्वीरूप शत्रुमर्दत नामक हाथी पर सवार होकर विन्ध्य के घोर
जंगलों में प्रविष्ट हुआ ॥१६१॥
जब वह कुछ ही दूर गया था तब उसने अपनी सेना को सहसा वापस भागते हुए
देखा ॥१६२॥
'यह क्या है'-ऐसा घबड़ाकर सोचते हुए राजा पृथ्वीरूप के समीप आकर हाथी पर
चढ़े हुए निर्भय नामक राजपुत्र ने कहा-'महाराज आगे भीलों की बड़ी सेना है। उन भीलों ने
हमारे पचास हाथी मार डाले और एक हजार पैदल सिपाही और तीन सौ घोड़े भी उन्होंने मार
डाले। इसी प्रकार, हमारे सैनिकों ने भी दो हजार भील मार दिये ॥१६३-१६५॥
यदि हमारी सेना में एक शव देखा जाता था तो उनकी सेना में दो। तब उनके बाण-वृष्टी
से मारे जाते हुए हमारे सैनिक वहाँ से भाग आये ॥१६६॥
यह सुनकर वह राजा पृथ्वीरूप तुरन्त दौड़ पड़ा और भीलों की सेना का इस प्रकार नाश
करने लगा जिस प्रकार कौरवों की सेना का संहार, अर्जुन ने किया था ॥१६७॥
निर्भय आदि राजकुमारों द्वारा अनेक भीलों के काट दिये जाने पर राजा पृथ्वीरूप ने
एक बाण से भीलों के सरदार का सिर काट दिया ॥१६८॥
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