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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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Page 498

नवम लम्बक ४६१
लंका से लौटने के पश्चात् भरत द्वारा सौंपे गये राज्य का पालन करते हुए राम
की पत्नी सीता ने गर्भ धारण किया ॥६५॥
उस अवसर पर प्रजा का समाचार जानने के लिए गुप्त रूप से अयोध्या में भ्रमण करते
हुए राम ने एक पुरुष को देखा ॥६६॥
जो अपनी पत्नी को हाथ से खींचकर बाहर निकाल रहा था और वह उसका यह दोष
घोषित कर रहा था कि उसकी स्त्री दूसरे व्यक्ति के घर पर जाकर रही ॥६७॥
राजा राम ने उस स्त्री को यह कहते हुए सुनकर अत्यन्त खेद और लज्जा का अनुभव
किया कि 'राक्षस के घर में रही हुई सीता को रामचन्द्र ने नहीं छोड़ा। यह मेरा पति उससे भी
बड़ा है, जो अपने ही बन्धु के घर में रही हुई मुझे त्याग रहा है, ॥६८ ६९॥
इस प्रकार, लोक-निन्दा के भय से राम ने सीता को वन में छोड़ दिया। सच है, यशस्वी
व्यक्ति विरह-क्लेश का सहन करते हैं किन्तु निन्दा का सहन नहीं करते ॥७०॥
भय के कारण खिन्न सीता वन से वाल्मीकि के आश्रम में पहुँची और उस ऋषि ने उसे
आश्वासन देकर वहीं ठहराया ॥७१॥
'सीता अवश्य दुष्टा है अन्यथा उसका पति उसे क्यों छोड़ देता ? तो प्रतिदिन उसका
दर्शन करने से लोगों को पाप चढ़ता है। वाल्मीकि तो दया के कारण उसे आश्रम से नहीं निकालते
और उसके दर्शन से होनेवाले पाप को तप से नष्ट करते हैं। तो चलो किसी दूसरे आश्रम
को चलें'-वाल्मीकि के आश्रम में रहनेवाले दूसरे मुनि इस प्रकार चर्चा करने लगे ॥७२-७४॥
दूसरे मुनियों के इन विचारों को सुनकर वाल्मीकि ने उनसे कहा-'इसमें सन्देह नहीं
कि यह सीता चरित्र से शुद्ध है। हे मुनियों मैंने ध्यान से इसे देख लिया है। फिर भी जब उन
मुनियों को अविश्वास रहा तब सीता ने कहा- 'आप लोग जैसा समझें उस प्रकार मेरी
शुद्धि की जाँच करें। यदि मैं अशुद्ध होऊँ तो मेरा शिर काटकर मुझे दंड दें। यह सुनकर
सभी दयाल मुनि कहने लगे। यहाँ घोर वन में टीटिभ सर नाम का तीर्थ है। प्राचीन समय में
किसी टिट्टिहरी को उसके (नर) टिट्टिहरे ने दूसरे टिट्टिहरे के संगम का मिथ्या दोष
लगाया था ॥७५-७८॥
इस कलंक के कारण दुःखित शरणहीन एवं अनाथा टिट्टिहरी पृथ्वी और लोकपालों का
दुहाई देकर विलाप करने लगी। तब उन्होंने उसकी शुद्धि के लिए उस सरोवर की
रचना की ॥७९॥