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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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नवम लम्बक ४५३
सरस और स्नेहपूर्ण आँखों से राजकुमार को देखती हुई वह दिव्यकुमारी भी स्वर
संभाषण को भूलकर उसके प्रेम में मग्न हो गई ॥८॥
नरवाहनदत्त के हृदय को जाननेवाले उसके साथी गोमुख ने उस कन्या की सखियों
से 'यह कौन है और किसकी कन्या है' आदि प्रश्न पूछने का जैसे ही विचार किया इतने
में ही तपे हुए स्वर्ण के समान रक्तवर्णवाली एक प्रौढ़ा विद्याधरी आकाश से नीचे
उतरी ॥९-१०॥
उतरकर वह उसी दिव्य कन्या के पास आकर बैठी। तब उस कन्या ने उठकर उसके
चरणों में झुककर प्रणाम किया ॥११॥
तब उस प्रौढ़ा विद्याधरी ने आशीर्वाद दिया कि 'तू समस्त विद्याधरों के चक्रवर्ती को
निर्विघ्न रूप से पति के रूप में प्राप्त कर' ॥१२॥
तब नरवाहनदत्त भी उसके पास जाकर और प्रणाम करके आशीर्वाद लेती हुई उस
सौम्य विद्याधरी से पूछने लगा—॥१३॥
माता यह कन्या कौन है और तुम्हारी कौन होती है बताओ । तब वह विद्याधरी
उससे कहने लगी—'सुनो मैं कहती हूँ ॥१४॥
अलंकारवती की कथा
हिमालय पर्वत के ऊपर सुन्दरपुर नाम का एक नगर है। उस नगर में अलंकारशील
नाम का विद्याधरों का राजा है॥१५॥
उदारगुणोंवाले उस राजा की कांचनप्रभा नाम की रानी है। समयानुसार उस रानी
से राजा के एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥१६॥
उसके उत्पन्न होने पर पार्वती ने स्वप्न में उसे यह आदेश दिया कि यह पुत्र
अत्यन्त धर्मशील होगा। तभी राजा ने तदनुसार उसका नाम धर्मशील रख दिया ॥१७॥
क्रमशः युवावस्था में पहुँचे हुए उस पुत्र को पिता ने अपनी विद्याएँ पढ़ाकर युवराज-पद
पर बैठा दिया ॥१८॥
युवराज-पद पर रहकर, एकमात्र धर्मपरायण और जितेन्द्रिय उस धर्मशील ने पिता से
भी बढ़कर प्रजा को प्रसन्न किया ॥१९॥
तदनन्तर, राजा अलंकारशील की महारानी कांचनप्रभा ने गर्भवती होकर एक कन्या
को जन्म दिया ॥२०॥
उस कन्या के उत्पन्न होने पर आकाशवाणी हुई कि यह कन्या विद्याधर चक्रवर्ती
नरवाहनदत्त की पत्नी होगी' ॥२१॥