Skip to content
SarvaKosh
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

Page 464 of 1079

Read in context
Page 464

अष्टम लम्बक ४२१
ब्रह्मा जबतक इस प्रकार कह रहे थे तभी प्रभास ने महान् पाशुपतास्त्र
चलाया ॥५४॥
सर्वसंहारक उस अस्त्र से भीषण संहार होते देखकर अपने अंश दामोदर के पुत्र
स्नेह से विष्णु ने सुदर्शन-चक्र चला दिया ॥५५॥
तब समान बलशाली उन दोनों दिव्यास्त्रों का सहसा विश्व के संहार का कारण तीनों
लोकों को व्याकुल करनेवाला युद्ध होने लगा ॥५६॥
'तुम अपने पाशुपत अस्त्र को हटा लो तो मैं भी अपने सुदर्शन चक्र को हटा लूँगा' विष्णु
के इस प्रकार कहने पर प्रभास उनसे बोला- ॥५७॥
मेरा चलाया हुआ अस्त्र व्यर्थ नहीं जायगा। दामोदर युद्ध-भूमि छोड़कर हट जाय तो
मैं अस्त्र-संहार कर सकता हूँ ॥५८॥
प्रभास के ऐसा कहने पर विष्णु ने कहा- तो तुम भी मेरे चक्र की मान-रक्षा करो।
जिससे दोनों विरक्त न हों' ॥५९॥
विष्णु का वचन सुनकर अवसर जाननेवाले प्रभास ने कहा- 'ठीक है आपका यह चक्र
मेरे रथ को तोड़ दे' ॥६०॥
विष्णु भगवान् के स्वीकार करने पर दामोदर युद्ध भूमि से लौट गया। फलतः प्रभास ने
पाशुपतास्त्र को लौटा लिया और उसके रथ पर सुदर्शन-चक्र गिरा ॥६१॥
तब प्रभास दूसरे रथ पर बैठकर सूर्यप्रभ के पास चला गया और उधर दामोदर भी
सुशर्मा के पास गया ॥६२॥
इसी बीच दुष्ट का अन्त होने के कारण पवित्र सुशर्मा का और सूर्यप्रभ का द्वन्द्व-युद्ध
अत्यन्त भीषण अवस्था में पहुँच गया ॥६३॥
सुशर्मा बड़े ही प्रयत्न से जिस अस्त्र का प्रयोग करता था सूर्यप्रभ उसी क्षण प्रति
अस्त्र से उसका प्रतिकार कर देता था ॥६४॥
इसके अतिरिक्त सुशर्मा ने जो जो इन्द्रजाल की माया फैलाई सूर्यप्रभ ने उन उन
का विरोधी माया से दूर कर दिया ॥६५॥
जब सुशर्मा ने अन्त काल में सूर्यप्रभ पर वज्रास्त्र का प्रयोग किया तब सूर्यप्रभ ने
भी पावक अस्त्र का प्रयोग कर दिया ॥६६॥
पावकास्त्र से उस वज्रास्त्र को दूर कर देनेपर पर सुशर्मा पर प्रहार हुआ तब क्रुद्ध होकर
[L29: महारथ से वह इधर उधर बाणों और से रथ चढ़ि अस्त्रों का सूर्यप्रभ पर प्रहार
किया ॥६७-६८॥