कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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अष्टम लम्बक ४२७
इस कारण क्रुद्ध कुबेर महामाय से युद्ध करने लगा। इसी प्रकार अनेक देवता अपने
अपने आंशिक पुत्र विद्याधरों के मारे जाने के कारण क्रुद्ध होकर दानवों और मानवों से युद्ध
करने लगे ॥३९॥
पल-पल में उछलते हुए मानवों और दानवों ने अनेक प्रसिद्ध विद्याधर राजाओं और
उनके सरदारों को मार डाला ॥४०॥
इधर प्रभास के साथ दामोदर का अस्त्रों और प्रत्यस्त्रों के द्वारा घमासान युद्ध चल
रहा था। कुछ समय कटे हुए धनुष और मरे हुए सारथीवाले दामोदर ने, दूसरा धनुष संभाल
और स्वयं घोड़े की लगाम पकड़कर युद्ध किया ॥४१-४२॥
दामोदर को साधुवाद देते हुए ब्रह्मा से इन्द्र ने पूछा—'प्रभो हारते हुए दामोदर को
आप साधुवाद क्यों दे रहे हैं? ॥४३॥
तब ब्रह्मा ने कहा—'क्यों न साधुवाद दूँ। यह दामोदर इस प्रभास के साथ इतनी देर
तक जमकर युद्ध कर रहा है यह साधारण बात नहीं है ॥४४॥
भगवान् विष्णु के अंश-स्वरूप दामोदर के अतिरिक्त कौन इस प्रभास से युद्ध कर
सकता है। क्योंकि अकेले प्रभास के लिए युद्ध में सभी देवता एक साथ मिलकर भी कम
हैं ॥४५॥
पूर्वकाल में युद्ध में सुरों का मर्दन करनेवाला नमुचि नाम का जो असुर था वह दूसरे
जन्म में सर्वस्तनमय प्रबल नाम से उत्पन्न हुआ। वही अब यह भास का पुत्र प्रभास हुआ है। भास
भी पहले कालनेमि नाम का महान् असुर था। दूसरे जन्म में वह हिरण्यकशिपु नाम का दैत्य हुआ।
तदनन्तर कपिंजल के नाम से अवतीर्ण हुआ। शुमुंडीक नाम का जो असुर था वह आज सूर्यप्रभ
हुआ है। पहले जन्म में हिरण्याक्ष नाम का जो दैत्य था वह अब सुनीथ के रूप में है। प्रहस्त
आदि ये सभी पूर्वजन्म के दैत्य और दानव हैं ॥४६-४९॥
तुम लोगों ने पहले जिन असुरों को मारा था वे ही इस समय मानव और दानव के रूप
में अवतीर्ण हुए हैं। इसीलिए, मय आदि सभी उनके पक्ष में हैं ॥५०॥
सूर्यप्रभ आदि द्वारा किये गये यज्ञ के स्विष्टकृत् हवन के प्रभाव से बन्धन-मुक्त होकर
बलि भी आज युद्ध देखने आया है ॥५१॥
यह (बलि) अपने सत्य-वचन की रक्षा के लिए पाताल-लोक में ही रहता है। तुम्हारा
राज्य-काल समाप्त होने पर वही इन्द्र बनेगा ॥५२॥
इस समय ये दानव और मानव शिवजी की कृपा के पात्र हैं। अब यह तुम्हारे विजय का
समय नहीं है। इसलिए सन्धि कर लो। आग्रह (हठ) करने से क्या लाभ है? ॥५३॥