कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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रथहीन प्रियंकर ने तलवार के एक ही प्रहार से रथहीन अक्रम के दो टुकड़े कर
डाले ॥२४॥
फेंके हुए अंकुश से धनुष के कटने पर धर्मदमन ने अतिबल को सहज में ही मार डाला॥२५॥
तब कुंजरकुमार ने अस्त्रों और प्रत्यस्त्रों के युद्ध में रथहीन बुरबर को बार-बार
मारा ॥२६॥
विक्रमशक्ति बुरबर के लिए बार-बार रथ उपस्थित करता था और अस्त्रों से अस्त्रों
को दूर कर अपनी रक्षा कर रहा था। तब कुंजरकुमार ने क्रुद्ध होकर दौड़ते हुए, भारी पत्थर
उठाकर विक्रमशक्ति के रथ पर फेंका ॥२७-२८॥
रथ के चूर-चूर हो जाने और विक्रमशक्ति के भाग जाने पर कुंजरकुमार ने उसी पत्थर
की मार से बुरबर को चूर्ण-विचूर्ण कर डाला ॥२९॥
सूर्यप्रभ ने श्रुतशर्मा से युद्ध करते हुए भी विरोचन को मार देने के क्रोध से एक ही बाण
से दम को मार डाला ॥३०॥
पुत्र-वध के क्रोध से अश्विनीकुमार देवता युद्ध के लिए उतर आये। सुनीथ ने उनको
रोका तो उन दोनों में घमासान युद्ध मच गया ॥३१॥
स्थिरबुद्धि शक्ति (अस्त्र) से पराक्रम को मारकर उसके वध से क्रुद्ध आठ वसुओं के
साथ लड़ने लगा ॥३२॥
दामोदर से युद्धरत प्रभास ने घास को रथहीन करनेवाले मथन को एक बाण से मार
डाला ॥३३॥
प्रकम्पन नामक दानव अस्त्रयुद्ध में तेजप्रभ को मारकर उसके वध से क्रुद्ध अग्निदेव
से युद्ध करने लगा ॥३४॥
यमपुत्र यमदंष्ट्र को मारनेवाले धूमकेतु दानव का उसके पिता यमराज के साथ युद्ध
हुआ ॥३५॥
सिंहदंष्ट्र पत्थर के प्रहार से सुरोपण को मारकर उसके वध से क्रुद्ध निर्ऋति देवता
से युद्ध करने लगा ॥३६॥
कालचक्र दानव ने चक्र से वायुबल (विद्याधर) के दो टुकड़े कर दिये। इस कारण
क्रुद्ध उसके पिता वायु के साथ उसका युद्ध होने लगा ॥३७॥
महामाय दानव ने सर्प पहाड़ वृक्ष आदि नाना प्रकार के रूप धारण करनेवाले कुबेरदत्त
नामक विद्याधर को गरुड़ वज्र और अग्नि का रूप धारण करके मार डाला ॥३८॥
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