कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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सूर्यप्रभ का श्रुतधर्मा के साथ और प्रभास का दामोदर के साथ द्वन्द्व-युद्ध प्रारम्भ हुआ।
इसी प्रकार, महोत्पात के साथ सिद्धार्थ का, ब्रह्मगुप्त के साथ प्रहस्त का और संगम के साथ
वीतमति का, चन्द्रगुप्त के साथ प्रहास्य का, अक्रम के साथ प्रियंकर का और अतिबल के साथ
सर्वदमन का द्वन्द्व-युद्ध होने लगा ॥९-११॥
इसी प्रकार, सुरेश्वर के साथ कुंजरकुमार भिड़ गया और अन्यान्य महारथियों के साथ
अन्यान्य महारथी भिड़ गये ॥१२॥
उनमें पहले महोत्पात ने बाणों से सिद्धार्थ के बाणों को और धनुष को काटकर उसके
सारथी और घोड़ों को भी मार डाला ॥१३॥
रथहीन और क्रुद्ध सिद्धार्थ ने भी रथ से कूदकर और दौड़कर लोहे के डंडे से महोत्पात के
रथ को भी चूर चूर कर डाला ॥१४॥
तब सिद्धार्थ ने महोत्पात के साथ बाहुयुद्ध करके उसे पटक दिया और जब पटककर उसे
मार डालना चाहा तब उसके पिता यम देवता ने उसकी रक्षा की और वह रणभूमि से उठकर
भाग गया ॥१५-१६॥
प्रहस्त और ब्रह्मगुप्त परस्पर रथहीन होकर पृथक् पृथक् पैंतरेबाजी के साथ तलवारों
से लड़ रहे थे। प्रहस्त ने तलवार से उसकी ढाल को काटकर पैंतरेबाजी के क्रम से ब्रह्मगुप्त
को पृथ्वी पर गिरा दिया ॥१७-१८॥
जब प्रहस्त गिरे हुए ब्रह्मगुप्त का सिर तलवार से काटने लगा तब उसके पिता ब्रह्मा ने
दूर से ही उसे स्वयं रोक दिया ॥१९॥
'तुम सब लोग अपने पुत्रों की रक्षा करने आये हो, युद्ध देखने नहीं' इस प्रकार कहते
हुए सभी दानव देवताओं की हँसी उड़ाने लगे ॥२०॥
इतने में ही वीतमय (वीतमिति) ने धनुष काटकर और सारथी को मारकर, हृदय
पर बाणों की वर्षा करके संक्रम को प्रद्युम्नास्त्र से मार डाला ॥२१॥
रथ के दूर चले जाने से पैदल लड़ते हुए प्रहास्य ने रथहीन और पैदल युद्ध करते हुए
चन्द्रगुप्त का मस्तक खड्ग-युद्ध में काट डाला ॥२२॥
तब पुत्र के वध से क्रुद्ध चन्द्रमा स्वयं युद्ध-भूमि में उतरकर प्रहास्य से लड़ने लगा।
फलतः उन दोनों का युद्ध बराबर का हुआ ॥२३॥