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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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[Header: षष्ठम लम्बक, ४०७]

तदनन्तर गुणधर्मा बलपूर्वक सबको विवश करके राजसभा से निकल गया और उसका
पीछा करते हुए एक सौ ग्यारह सिपाहियों को भी उसने मार डाला॥१४९॥
तब आँख में बचे हुए अंजन को लगाकर वह अन्तर्धान होकर उसी क्षण उस देश से बाहर
चला गया ॥१५०॥
दक्षिण-पथ की ओर जाते हुए उसने मार्ग में सोचा कि 'रानी अधोकवती ने अवश्य उस
मूर्ख को उकसाया है' ॥१५१॥
प्रेमी द्वारा अपमानित स्त्रियां विष से भी अधिक भीषण होती हैं और असत्प्रवर्ती
(अविवेकी) राजा भी सज्जनों के लिए सेवनीय नहीं होते ॥१५२॥
ऐसा सोचता हुआ गुणधर्मा एक गाँव में पहुँचा और वहाँ उसने वटवृक्ष के नीचे बैठे हुए
एक ब्राह्मण को देखा जो शिष्यों को पढ़ा रहा था। उसके पास जाकर गुणधर्मा ने प्रणाम किया।
उस ब्राह्मण ने भी उसका स्वागत-सत्कार करके पूछा—'हे ब्राह्मण देवता! कौन-सी शाखा का
अध्ययन करते हो बताओ। तब गुणधर्मा उस ब्राह्मण से कहने लगा—'हे विद्वान्! मैं बारह
शाखाओं का अध्ययन करता हूँ। दो सामवेद से दो ऋग्वेद से सात यजुर्वेद से और एक
अथर्व से ॥१५३—१५६॥
यह सुनकर वह ब्राह्मण बोला-'तब तो तुम देवता-स्वरूप हो। प्रभावशाली आकृति से
उत्कृष्ट प्रतीत होते हुए गुणधर्मा से ब्राह्मण ने पुनः नम्रतापूर्वक कहा—'यह तो बताओ कि तुम
अपने जन्म से कौन-सा देश और कौन-सा कुल अलंकृत करते हो? और तुम्हारा नाम क्या है।
तुमने कहाँ पढ़ा? ॥१५७–१५८॥

गुणधर्मा का जन्म-वृत्तान्त

यह सुनकर गुणधर्मा कहने लगा—"उज्जयिनी नगरी म आदित्यधर्मा नाम का एक
ब्राह्मण-कुमार रहता था ॥१५९॥
बाल्यकाल में ही उसके पिता की मृत्यु हो गई और उसकी माता उसी के साथ सती
हो गई ॥१६०॥
तब वह आदित्यधर्मा वेदों और कलाओं का अध्ययन करता हुआ उसी नगरी में अपने
मामा के घर पर रहने लगा ॥१६१॥
विद्याध्ययन के अनन्तर मन्त्र की बात करनेवाले आदित्यधर्मा की मित्रता एक संन्यासी
के साथ हो गई ॥१६२॥
वह संन्यासी उस मित्र आदित्यधर्मा के साथ यक्षिणी की सिद्धि के लिए श्मशान में जाकर
हवन करता था ॥१६३॥