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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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Page 440

अष्टम लम्बक ४५
राजा ने सभासदों से कहा—'गुणशर्मा के लिए मेरा न्याय सुनो। यह सुनकर गुणशर्मा
ने कहा—'मैं सेवक हूँ आप मेरे स्वामी हैं, अतः मेरा और आपका व्यवहार समान नहीं हो सकता।
पहले आप अपने आसन पर बैठें फिर जो इच्छा हो आज्ञा करें' ॥१३४-१३५॥
धैर्यशाली गुणशर्मा द्वारा इस प्रकार कहा गया और सभ्यों द्वारा समझाया गया राजा
अपने आसन पर बैठ गया और सभ्या से बोला—॥१३६॥
'आपलोगों को विदित है कि कुलक्रम से आये हुए मन्त्रियों को छोड़कर मैंने इस गुणशर्मा
को अपने समान बना डाला। अब आप लोग सुनिए कि इसने दूतों के यातायात द्वारा गौडदेश
के राजा से मिलकर राजद्रोह करने की सोची। ऐसा कहकर राजा ने रानी अशोकमती की
बनावटी बातें सभा में सुना दीं। इसके अतिरिक्त उसने अन्य लोगों को हटाकर अत्यन्त
आत्मीय व्यक्तियों से रानी अशोकमती के सतीत्व-नाश करने की उसकी चेष्टा भी
स्पष्ट कर दी ॥१३७—१४०॥
तब गुणशर्मा ने कहा—'राजन् आपको यह झूठी बात किसने कह दी। और, यह
आकाश-चित्र किसने बनाया ॥१४१॥
यह सुनते ही राजा ने कहा—'हे पापी यदि यह सच नहीं है, तो भोजन-पात्र के अन्दर पड़े
हुए विष का पता तुम्हें कैसे चला ? ॥१४२॥
बुद्धि से सब कुछ जाना जा सकता है' गुणशर्मा के इस प्रकार कहने पर उसके
शत्रु अन्य मन्त्री बोले—'यह असम्भव है महाराज ! 'तत्व की खोज किये बिना आपको
ऐसा न कहना चाहिए। राजा और वह भी विवेक-हीन हो तो प्रशंसनीय नहीं कहा जा
सकता' ॥१४३-१४४॥
गुणशर्मा जब यह कह ही रहा था कि राजा ने उठकर उस पर छुरे का प्रहार करते हुए
कहा कि 'तू बड़ा ढीठ है' ॥१४५॥
गुणशर्मा ने करभ प्रयोग १ (कलावाजी) से उस प्रहार को बचा लिया यह देखकर
अन्य दरबारियों ने भी उस पर छुरे से प्रहार कर दिया ॥१४६॥
आश्चर्यजनक कलावाज गुणशर्मा ने अपनी विचित्र कला से उन सबकी छुरियां छीन लीं
और उन्हें ही सिर के बालों से आपस में बाँध दिया ॥१४७-१४८॥
१ करभ-प्रयोग, एक प्रकार की पैंतरेबाजी।