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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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अष्टम लम्बक ४०१
यह सुनकर राजा के विश्वस्त रसोईदार ने कहा—'यह काम मैं कर दूंगा। द्रव्य का
अपव्यय न करो' ॥१ ४॥
ऐसा कहकर गुणशर्मा के दूत को बाँधकर कैद में डाल दिया और रसोईदार गुप्त रूप
से तुम्हें विष देने के लिए यहाँ आया ॥१ ५॥
इसी बीच गुणशर्मा का दूत किसी प्रकार जेल से भागकर यहाँ आ गया और उसने रसोईदार
का समस्त समाचार गुणशर्मा से सुनाया। पाचक हमारे भोजनालय में था इसलिए उस
दुष्ट ब्राह्मण ने विष देते हुए तुम्हें बताकर उसे मरवा डाला ॥१ ६—१ ८॥
जब उस रसोईदार का समाचार जानने के लिए आये हुए उसकी माता स्त्री तथा भाइयों
को जानकर उस बुद्धिमान् गुणशर्मा ने उन सबको मार डाला किन्तु उसका भाई भागकर दैवयोग
से मेरे घर आ गया ॥१ ९—११ ॥
उस शरणार्थी ने मुझे सब समाचार सुनाया और इतने में गुणशर्मा भी मेरे वासगृह में
आया ॥१११॥
उसे देखकर और मुझसे उसका नाम जानकर वह रसोइये का भाई भय से न जाने कहाँ
भाग गया ॥११२॥
गुणशर्मा भी अपने सेवकों से बचाये हुए उसे मेरे पास देखकर कुछ सोचते-सोचते तुरन्त
मलिन हो गया ॥११३॥
'गुणशर्मन् आज तुम कुछ दूसरे-से क्यों मालूम हो रहे हो? —मैंने उसका भाव जानने के
लिए एकान्त में उससे पूछा ॥११४॥
गुणशर्मा रहस्य खुलने के भय से मुझे स्वीकार करने की इच्छा से बोला—'रानी मैं तुम्हारी
प्रेमाग्नि से जल रहा हूँ। अतः, तुम मुझे स्वीकार करो। अन्यथा मैं नहीं जिऊँगा। मुझे प्राणों की
भिक्षा दो। इस प्रकार कहकर वह सूने घर में मेरे पैरों पर गिर पड़ा ॥११५ ११६॥
तब मैं पैर छुड़ाकर जब उठी तब उसने मुझ अबला को बलपूर्वक अपने से
लिपटा लिया ॥११७॥
उसी समय मेरी सेविका पल्लविका अन्दर आई। उसे देखकर वह गुणशर्मा भय से बाहर
चला गया ॥११८॥
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