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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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अष्टम लम्बक १८४
राजपूत-वीर शतानीक ने दस विद्याधरों को मार दिया उनके नाम इस प्रकार हैं—मेघ-
बाहन सिंहबल कपिकेश चित्रापीड जगज्ज्वर, शूर, कान्तापति महाबल सुवर्मा कामभग एवं
क्रोधपति। इनके अतिरिक्त बलदेव और राजा विचित्रापीड ये दो विद्याधर—राजा
थे॥११५-११६॥
इस प्रकार, वीरों के मारे जाने पर और विद्याधरों की सेना का क्षय देखकर श्रुतशर्मा क्रोध
करके शतानीक पर स्वयं दौड़ पड़ा ॥११६॥
तदनन्तर, दोनों दलों में सायंकाल तक प्रलयंकारी भीषण संग्राम हुआ जिसे देखकर देवता
भी चकित रह गये ॥११७॥
सन्ध्या होने पर सैकड़ों कबन्ध (धड़) भूत,प्रेतों से आविष्ट होकर सन्ध्याकालीन नृत्योत्सव
के लिए उठ खड़े हुए ॥११८॥
तदनन्तर, रात्रि के प्रारम्भ होने पर बहुत अधिक सेना के विनाश से व्याकुल और मारे
गये बन्धु-बान्धवों के कारण दुःखित विद्याधर तथा हठात् जय प्राप्त किये हुए मनुष्य और असुर
युद्ध बन्द करके अपने-अपने शिविरों में गये ॥११९॥
उसी समय सुमेरु द्वारा सूचित किये गये विद्याधर महारथियों के दो नेता श्रुतशर्मा का
पक्ष छोड़कर सूर्यप्रभ के समीप आकर उसे प्रणाम करके बोले—॥१२०॥
“महामाय और सुमाय नाम के हम दोनों वीर तीसरा सिंहबल जो (युद्ध में मारा गया)
महाश्मशान के अधिपतिस्व से सिद्ध हैं। अतः दूसरे विद्याधर राजा हमें पराजित नहीं कर
सकते ॥१२१॥
किसी समय यमराज के मध्य बैठे हुए हम तीनों के पास सदा प्रसन्न रहनेवाली और दिव्य
प्रभावशालिनी धरमानना नाम की योगिनी आई ॥१२२॥
प्रणाम के साथ 'तुम कहाँ रहती हो ? वहाँ का क्या समाचार है ? और, तुमने
कौन-सी अपूर्व बात देखी ?' इस प्रकार, हम लोगों से पूछी गई वह योगिनी कहने लगी-॥१२३॥
धरमानना योगिनी के पराक्रम की कथा
मैं अपनी साबित योगिनियों के साथ अपने स्वामी महाकाल का दर्शन करने के लिए गई थी
वहाँ पर मेरे सामने ही एक बेतालपति महाकाल से बोला—॥१२४॥
महाराज विद्याधर-राजाओं द्वारा नियुक्त बानिक नामक हमारे महासेनापति की अपूर्व
रूपशालिनी कन्या को तेजःप्रभ सहसा हरण करके ले जा रहा है ॥१२५॥