कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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उनमें से एक विश्वावसु की पत्नी में उत्पन्न नक्षिन्न के समान श्याम वर्ण भयंकर था।
दूसरा नियमक था जो जम्भक की पत्नी में भौम (मगल) से उत्पन्न रक्तवर्ण का था।
तीसरा कालकाप नामक विद्याधर था जो दामोदर की पत्नी में दामोदर से उत्पन्न
हुआ था। वह अत्यन्त काले रंग का और पीछे केशोंवाला था। चौथा चन्द्रमा की पत्नी में इन्द्र
से उत्पन्न विक्रमशक्ति था। ये तीन अतिरथियों के दल के नेता थे। चौथा सबसे अधिक बलशाली
महावीर नामक विद्याधर था। ये सब पावकों की भाँति उन्मत्त होकर दिव्यास्त्रों से प्रभास को
लड़ाने लगे ॥६९-७२॥
प्रभास ने नारायणास्त्र से उनके अस्त्रों के जाल को दूर फेंककर एक-एक क धनुष को आठ-
आठ बार शीघ्र ही काट डाला ॥७४॥
तब भी शस्त्रास्त्रों की मार करते हुए उन सबके साथी घोड़ों आदि को मारकर प्रभास ने
उन्हें रथहीन कर दिया ॥७५॥
यह देखकर श्रुतधर्मा ने रथ और रथियों के नायक विद्याधरों को प्रभास से युद्ध करने के
लिए भेजा ॥७६॥
उनके नाम इस प्रकार थे—केतुमालेश्वर के क्षेत्र में अश्विनीकुमार से उत्पन्न और नाम
के समान ही आकृतिवाले दम नियम विक्रम संक्रम पराक्रम अक्रम संमर्दन मर्दन प्रमर्दन
और विमर्दन। इनमें अन्तिम आठ मकरन्द के क्षेत्र मे आठ वसुओं द्वारा उत्पन्न हुए थे। उनके
आने पर पहले चार भी जो रथहीन थे रथों पर बैठ गये ॥७७-७९॥
एक साथ बाण-वर्षा करते हुए उन चौदहों महारथियों के साथ अकेला प्रभास अविचल भाव
से युद्ध करता रहा यह आश्चर्य है । ॥८ ॥
तब सूर्यप्रभ के आदेश से कुंजरकुमार और प्रहस्त शस्त्रों को लिये हुए व्यूह के अग्रभाग में
कूद छोड़कर और आकाश-मार्ग से उड़कर राम और कृष्ण के समान प्रभास की सहायता के लिए
जा पहुँचे ॥८१-८२॥
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