कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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इस प्रकार, प्रभास ने शत्रु को अपने हाथ की आश्चर्यजनक सफाई दिखलाई। मानों
प्रभास ने पहिले दिन मारे गये अपने पक्ष के अनेक वीरों को मारने का क्रोध-पूर्ण बदला
ले लिया ॥३९-४०॥
इस प्रकार, मनुष्य और असुरों द्वारा विद्याधरराज के मारे जाने से सारे विद्याधर-दल में
शोक और हाहाकार-मच गया ॥४१॥
तब कालकंजर का राजा विद्युत्प्रभ कोप से प्रभास की ओर झपटा ॥४२॥
प्रभास ने लड़ते हुए विद्युत्प्रभ की महान् ध्वजा को बाण से काटकर और बार-बार
नये-नये उठाये धनुष को भी काटना प्रारम्भ किया ॥४३॥
तब विवश होकर विद्युत्प्रभा माया से आकाश में उड़कर छिप गया और रुष्ट होकर
आकाश से प्रभास पर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करने लगा ॥४४॥
प्रभास ने भी उसके शस्त्रास्त्रों को दूर करके प्रकाशानास्त्र के प्रभाव से छिपे हुए उसको
दृश्य किया और आग्नेयास्त्र के प्रयोग से उसे जलाकर भूमि पर गिरा दिया ॥४५-४६॥
यह देखकर श्रुतशर्मा ने अपने महारथियों से कहा—देखो इस प्रभास ने हमारे दो
महारथियों के सरदारों को मार गिराया ॥४७॥
तो तुमलोग कैसे सहन कर रहे हो सब मिलकर उसे मार डालो। यह सुनकर विद्याधरों
के आठ महारथी उसके सामने आये ॥४८॥
इन आठों में एक कर्कटक पर्वत का निवासी विद्याधरराज था जो ऊर्ध्वरोमा के नाम से
विख्यात था ॥४९॥
दूसरा महारथी करवीरपुर या पर्वतशिरोति विकटाक्ष नाम का था। तीसरा लीला-पर्वत
पर रहनेवाला अतिरुचिया का बेटा इन्दुमाली नामक विद्याधर का राजा था ॥५०-५१॥
चौथा गव्हरा में श्रेष्ठ कन्दर-पर्वत का निवासी रतिदंडी का बेटा काकाहक था ॥५२॥
पाँचवाँ त्रिशृङ्ग-पर्वत का राजा दंष्ट्राह्व था। छठा अंजनगिरि का राजा धूर्त
मद्दल था ॥५३॥