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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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अष्टम लम्बक ११५
देश रूप अवस्था चेष्टा विज्ञान आदि के भेद से अच्छी स्त्रियाँ भिन्न-भिन्न गुणावाली
होती हैं। एक ही स्त्री सर्वगुण-सम्पन्न नहीं हुआ करती ॥१०५॥
कर्णाट, लाट, सौराष्ट्र मध्यदेश आदि की स्त्रियाँ अपनी-अपनी विशेषताओं से पति
का मनोरञ्जन करती हैं ॥१०६॥
कुछ सुन्दरियां शरत्कालीन चन्द्रमा के समान मुख से मन हरण करती हैं, कुछ सोने के घड़ों
के समान उठे और बने स्तनो से चित्त रंजन करती हैं कुछ स्त्रियाँ काम के सिंहासन के समान
जघनस्थल से आकर्षण करती हैं और कुछ दूसरे-दूसरे सौन्दर्य से तथा आकर्षक अंगों से मनोहरण
करती हैं। कोई तपे हुए स्वर्ण के समान वर्णवाली होती हैं कुछ प्रियंगु पुष्प के समान साँवले वर्ण की
होती हैं और कुछ रुखाई लिये हुए गौर वर्ण की होती हैं, जो देखते ही मन को मोहित कर
देती हैं॥१०७-१०९॥
कुछ नई अवस्था के कारण सुन्दर होती हैं, तो कुछ यौवन के पूर्ण विकसित होने पर मनोरम
हो जाती हैं। कुछ स्त्रियां प्रौढ़ता के कारण सरस होती हैं और कुछ अपने हाव-भाव-विलास से अपने
सौन्दर्य की छटा दिखाती हैं॥११०॥
कोई हँसती हुई प्यारी लगती हैं तो कोई क्रुद्ध होने पर मनोहरण करती हैं। कोई गज
गामिनी होती हैं और कोई हंसगामिनी होने के कारण अच्छी लगती हैं॥१११॥
कुछ स्त्रियां मधुर भाषण के अमृत से कानों को सिक्त करती हैं और कोई सहज भ्रू
विलास से देखती हुई अच्छी लगती हैं ॥११२॥
कोई नाचने में निपुण होती हैं तो कोई गाने में कुशल होती हैं। कोई वाद्य-कला
में पारंगत होने के कारण श्लाघ्य होती हैं ॥११३॥
कोई स्त्री बाहरी रति विलास में दक्ष होती हैं, तो कोई अन्तरंग रति विलास में चतुर
होती हैं। कोई श्रृंगार करने में निपुण होती हैं तो कोई बात करने में चतुर ॥११४॥
और, कोई पति के चित्त को वश में करके सौभाग्य प्राप्त करती हैं। कहाँ तक कहूँ भिन्न
भिन्न स्त्रियों में भिन्न-भिन्न प्रकार के गुण होते हैं ॥११५॥
इन सब गुणों में से किसी में कोई और किसी में कोई अपना विशिष्ट गुण होता है। किन्तु,
तीनों लोकों में भी कोई स्त्री सर्व-गुण-सम्पन्न नहीं मिलती ॥११६॥
इसलिए, भिन्न-भिन्न रसों के आस्वाद लेने के लोभी राजा लोग सदा नई-नई स्त्रियों से
विवाह किया करते हैं ॥११७॥
उच्च कोटि के व्यक्ति दूसरों की स्त्रियों को नही चाहते। इसलिए, हमारे आर्यपुत्र
(अशिष्ट विवाह करके) दोषी नहीं हैं और न हमलोगों को इसमें ईर्ष्या ही करनी
चाहिए ॥११८॥
इस प्रकार मनोवती के कहने पर सूर्यप्रभ की मदनसेना आदि स्त्रियाँ क्रमशः इसी प्रकार
की चर्चा करने लगीं ॥११९॥