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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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अष्टम लम्बक १६७
तदनन्तर, किसी प्रकार की रोक-टोक के बिना वे स्त्रियाँ स्वच्छन्द भाव से गुप्त रहस्य की
बातें भी करने लगीं। किसी अवसर पर एकत्र हुई और वार्तालाप के रस में निमग्न स्त्रियाँ
आपस में ऐसी कौन-सी बात है जिसे नहीं कह डालतीं ॥१२०॥
अँधेरे के बीतने की प्रतीक्षा करता हुआ और शत्रु-दल पर विजय की कामना करता हुआ सूर्यप्रभ
की वह लम्बी रात्रि क्रमशः समाप्त हुई और उधर बातचीत के रस में निमग्न उसकी पत्नियों की
वह लम्बी चर्चा भी क्रमशः समाप्त हो गई ॥१२१॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के सूर्यप्रभ लम्बक का
चतुर्थ तरंग समाप्त
पञ्चम तरङ्ग
सूर्यप्रभ चरित रणभूमि में संग्राम
प्रभात-काल होते ही वे सूर्यप्रभ आदि तथा श्रुतशर्मा आदि तैयार होकर अपनी-अपनी
सेनाओं के साथ रणभूमि में आकर डट गये ॥१॥
और ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र आदि देवता तथा असुर, यक्ष, गन्धर्व एवं राक्षस आदि युद्ध
देखने के लिए आकाश के अवकाश में विमानों में सवार होकर एकत्र हो गये ॥२॥
श्रुतशर्मा की सेना में सेनापति दामोदर ने चक्रव्यूह बनाया और सूर्यप्रभ की सेना में
सेनापति प्रभास ने वज्रव्यूह की रचना की ॥३॥
व्यूह रचना के पश्चात् दोनों सेनाओं का युद्ध प्रारम्भ हुआ और रणवाद्य तथा सैनिकों
के रणनादों से भारी चिल्लाहट गूँज उठी ॥४॥
भली भाँति सहायता करने योग्य वीर सूर्य मण्डल का भेदन करते हैं इसलिए भय से
भगाये गये कायरों को सहायता के योग्य न समझकर छोड़ दिये ॥५॥
एकाकार व छल-रहित चक्र-व्यूह वायु-भरे चीर से आबद्ध बनकर सूर्यप्रभ की सेना में
प्रवाल-कुण्डलों सहित काक-पक्ष में प्रवेश कर गया ॥६॥
प्रभास द्वारा व्यूह से वियुक्त होकर पृथक् रूप में शत्रुदल पर आक्रमण कर दिया और कहीं
रथ-समूह पर तो कहीं गजदल उलट-पलट करने लगा ॥७॥
तब दामोदर ने प्रभास को जय के साधन में बाधा देखकर उसकी सहायता के लिए अन्य
महारथियों को उसके पीछे भेजा ॥८॥
१. रणभूमि में मारे गए शूर-वीर और योगिनी-डाकिनी की आपस में 'सूर्य-मण्डल का
भेदन करके देखने ऊपर सत्यलोक में जाती हूँ।' —अनु०