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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

Page 376 of 1079

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Page 376

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षष्ठम लम्बक १७५
तथा यक्षों और किन्नरों ने भी गुहा में उसका स्वागत किया इसका क्या रहस्य है?
यह सुनकर सभी को सुनाते हुए मुनि गुणघकुमार ने कहा—'सुनो कहता हूँ। प्रभास
गुप्तप्रभ का अत्यन्त हितकारी है, इन दोनों में परस्पर भेद नहीं है॥२१३-२१४॥
प्रभास के समान शूरता और प्रभावशालिता में दूसरा व्यक्ति नहीं है। इसके पूर्वजन्म
के पुण्य प्रभाव से यह गुफा वशी की है॥२१५॥
अब इसके पूर्वजन्म का हाल कहता हूँ जैसा कि वह पहले था। प्राचीन समय में नमुचि
नाम का श्रेष्ठ दानव था॥२१६॥
वह इतना महान् दानी था कि माँगते हुए शत्रु के लिए भी उसे कुछ अदेय
नहीं था॥२१७॥
उसने दस हज़ार वर्षों तक केवल धुँआँ पीकर ही तपस्या की। इस कारण उसने ब्रह्मा से
वर प्राप्त किया कि वह लोहा पत्थर और लकड़ी से मारा न जाय॥२१८॥
तब उसने इन्द्र को बाँधकर भगा दिया। कश्यप आदि महर्षियों ने मध्यस्थ बन करके
देवसभा में उसकी सन्धि (मित्रता) करा दी॥२१९॥
तदनन्तर, सुरों और असुरों ने परस्पर बैर-भाव छोड़कर मन्दराचल द्वारा क्षीरसमुद्र का
मथन किया और उससे निकले हुए लक्ष्मी आदि रत्नों को विष्णु आदि देवताओं ने परस्पर बाँट लिया
और उसी नियमानुसार नमुचि दानव के अपने हिस्से में उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा
पाया॥२२०-२२१॥
इसी प्रकार, भगवान् देवताओं और दानवों ने ब्रह्मा के निदेशन के अनुसार समुद्र से निकले
रत्नों को बाँट लिया॥२२२॥
मन्थन के अन्त में जब अमृत निकला तब उसे देवता लोग हरण कर ले गए। इस कारण
देवों और दानवों की आपस में फिर शत्रुता हो गई॥२२३॥
और उनमें परस्पर युद्ध हुआ। इस युद्ध में जो भी असुर सुरों द्वारा मारे जाते थे उन्हें
उच्चैःश्रवा सूँघ-सूँघकर पसीने द्वारा पुनर्जीवित कर देता था॥२२४॥
इस कारण दैत्य और दानव देवताओं के लिए अजेय हो गए। तब चिन्तित इन्द्र को
एकान्त में ले जाकर बृहस्पति ने कहा—'अब तुम्हारे लिए एक ही उपाय है। उसे शीघ्र ही कर डालो।
तुम स्वयं जाकर नमुचि से उच्चैःश्रवा को दान में माँगो॥२२५-२२६॥
क्योंकि नमुचि दानव ऐसा दानी है कि वह अपनी दानशीलता के कारण प्राणों के लिए पूछे जाने पर
संकोच नहीं करेगा। तब उसने इन्द्र से छल किया और इन्द्र द्वारा वध का भागी होने के कारण वह मारा
गया॥२२७॥
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