कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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तेजप्रभ नामक विद्याधरों का राजा उसे पकड़ने के लिए उठा, उसे भी अजगर ने फूंक
से दूर फेंक दिया ॥६६॥
तब दुष्टदमन नामक विद्याधर उसे पकड़ने गया, उसे भी अजगर ने दूसरों के समान ही
दूर फेंक दिया ॥६७॥
तदनन्तर, विक्रयरुचि नामक विद्याधरराज उसकी ओर गया और उसे भी उसने
तिनके के समान दूर फेंक दिया ॥६८॥
इस प्रकार, वहाँ उपस्थित सभी विद्याधरों के राजाओं के उसे पकड़ने का प्रयत्न करने पर
उसने सभी को श्वास के झोंकों से ऐसा पटका कि उनके अंग पत्थरों से टकराकर चूर हो गये और
किसी भी तरह वे फिर उठ न सके। इसके पश्चात् श्रुतशर्मा बड़े अभिमान से सर्प की ओर दौड़ा
और उसे भी सर्प ने अपने श्वास से बहुत दूर फेंक दिया। पत्थरों की टक्कर से चूर-चूर हुए अंगों-
वाले और लज्जित श्रुतशर्मा के फेंके जाने पर सुमह ने सूर्यप्रभ को उसे पकड़ने के लिए भेजा। 'देखो
यह भी इस सर्प को पकड़ने के लिए उठा है। ये मनुष्य बन्दरों की भाँति विचारहीन होते हैं।
दूसरों से जो कुछ भी किया जाता है, उसकी ये नकल करते हैं। इस प्रकार, कहते हुए सभी
विद्याधर राजा सूर्यप्रभ की हँसी उड़ाने लगे ॥६९-७५॥
उनके हँसते हुए ही सूर्यप्रभ ने मुँह बन्द किये हुए उस अजगर को पकड़ लिया और बिल से
बाहर खींच लिया ॥७६॥
उसी समय वह सर्प तरकस बन गया और सूर्यप्रभ के सिर पर आकाश से पुष्पवर्षा
हुई ॥७७॥
तदनन्तर आकाशवाणी हुई—'हे सूर्यप्रभ तुम्हारे लिए यह तूणीर-रत्न सिद्ध हो गया
इसे ग्रहण करो ॥७८॥
तब सभी विद्याधर, म्लान और लज्जित हो गये। सूर्यप्रभ ने उसे स्वीकार कर लिया।
यह सुनीथ सुमेरु आदि अति प्रसन्न हुए ॥७९॥