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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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अष्टम लम्बक १०९
इस प्रकार, माताओं के आदेश को पाकर मय आदि सभी ने उसी प्रकार दिव्य आश्रम
में जाकर कश्यप प्रजापति के दर्शन किये ॥१७० ॥
मुनि का रंग पिघले हुए विशुद्ध सोने के समान था उनका मुख दिव्य दीप्ति से
चमकता था। अग्नि-ज्वाला के समान पीत वर्ण की उनकी जटाएँ थीं और वे स्वयं भी
अग्नि के समान दुर्धर्ष थे ॥१७१॥
वे सब उनके समीप जाकर क्रमशः उनके चरणों में गिर पड़े। तदनन्तर मुनि भी
उन्हें बार-बार आशीर्वाद देते हुए सन्तोष और प्रसन्नता से बोले- ॥१७२॥
'मुझे अत्यन्त आनन्द हो रहा है कि मैंने तुम सब सन्तानों को आज देखा। हे मय तू
प्रशंसनीय है। तू सभी विद्याओं का जानकार है और सत्पथ से विचलित नहीं हुआ है। सुनीथ
तू भी धन्य है कि तूने गये हुए जीवन को पुनः प्राप्त किया। हे सूर्यप्रभ तू भी धन्य है कि
आकाशचारी विद्याधरों का चक्रवर्ती बनेगा ॥१७३॥
तुम लोगों को धार्मिक मार्ग का अनुसरण करना चाहिए और हमारी बातों को समझना
चाहिए। इससे तुम अनुपम ऐश्वर्य प्राप्त करके शाश्वत सुख प्राप्त करोगे और शत्रुओं से पहले के
समान पराजय भी तुम्हारा न होगा। धर्म का उल्लंघन करनेवाले असुर विष्णु के चक्र के वशीभूत
हुए थे ॥१७४॥
हे सुनीथ वे देवताओं से मारे गये असुर ही मानव-शरीर लेकर पृथ्वी पर अवतीर्ण
हुए हैं। जो तुम्हारा छोटा भाई सुमुण्डीक था वह अब सूर्यप्रभ के रूप में अवतीर्ण
हुआ है ॥१७५॥
और भी इसके मित्र असुर इस जन्म में इसके बन्धु-बान्धव हुए हैं जो शम्बर नाम का
महाअसुर था वह प्रहस्त नाम से सूर्यप्रभ का मन्त्री हुआ है ॥१७६॥
त्रिशिरा नाम का जो असुर था वह संवेका सिद्धार्थ नाम का मन्त्री हुआ है। वातापि नाम
का जो असुर था वह प्रकृष्टय नाम से इसका मन्त्री हुआ है ॥१७७॥
उलूक नाम का दानव ही इसका धुर्मन्दर नाम का मित्र हुआ है। वीतिभीति नाम का
इसका मित्र पहले काल नामक दानव था और यह भास नाम का इसका मन्त्री भी वृषपर्वा
नाम का दानव था और प्रभास नाम का मित्र पहले प्रबल नामक दैत्य था। इस रत्नमय
महासत्त्वशाली ने देवताओं की प्रार्थना की उपेक्षा कर अपने शरीर को खण्ड-खण्ड कर अवतार
लिया जिससे समस्त प्रकार के रत्न पैदा हुए। इससे संतुष्ट चण्डिका ने इसे दूसरे शरीर
के अनुकूल कर दिया जिससे यह अपने शत्रुओं के लिए महा दुःसह हो गया ॥१७८-१८१॥
पूर्वजन्म में सुन्द और उपसुन्द नाम के जो दानव थे वे अब सर्वदमन और भयंकर
नाम से उसके मन्त्री और मित्र हुए हैं ॥१८२॥