कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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वहाँ उसने नव संगम में उत्कंठित स्निग्ध और मुग्ध उस त्रैलोक्यसुन्दरी कुमुद्वती
के साथ विनोद-वार्ता में रात बिताई ॥१२८॥
प्रातःकाल ही तन्तुच्छ नामक सातवें पाताल के राजा ने प्रह्लाद आदि को सादर
निमन्त्रित किया और वह निमन्त्रण देकर सबको अपने घर ले गया ॥१२९॥
वहाँ पर तन्तुच्छ ने कुन्दन-सी गौरवर्ण रत्नालंकारों से अलंकृत अपनी सुन्दरी कन्या
मनोवती सूर्यप्रभ को प्रदान की ॥१३० ॥
सूर्यप्रभ ने अत्यन्त सुखद उस दिन को बिता कर मनोवती के साथ नवीन आलिंगन से
मधुर रात्रि भी व्यतीत की ॥१३१॥
दूसरे दिन उसी प्रकार सबको निमन्त्रण देकर सुमाय नामक असुरराज सबको अपने
छठे पाताल में ले गया ॥१३२॥
वहाँ पर उसने भी धूप के समान श्याम रंगवाली काम की सजीव मूर्ति-सी सुभद्रा नाम की
कन्या सूर्यप्रभ को प्रदान की ॥१३३॥
और सूर्यप्रभ भी उस दिन उसी चन्द्रवदनी षोडशी श्यामा के साथ रहा ॥१३४॥
उसके दूसरे दिन राजा बली सूर्यप्रभ को अपने तीसरे पाताल में ले गया और नये मूंगे
के समान रंगवाली वासन्ती लता के समान यौवन से भरी सुन्दरी नाम की कन्या उसे प्रदान
की। सूर्यप्रभ ने दिव्य भोगों से भरे हुए उस लोक में सुन्दरी के विनोद में दिन व्यतीत
किया ॥१३५-१३७॥
दूसरे दिन चौथे पाताल में गये हुए राजकुमार सूर्यप्रभ को मयासुर फिर अपने घर ले
गया ॥१३८॥
उसके लोक में उसकी माया से रत्नों के विचित्र महल बने हुए थे और प्रतिक्षण उनकी
नई-नई झिलमिल झलक दीख रही थी ॥१३९॥
मय ने भी वहाँ पर जगत् के लिए आश्चर्यजनक रूपवाली और मूर्तिमयी शक्ति के समान
अपनी सुमाया नाम की कन्या उसे प्रदान की ॥१४० ॥
सूर्यप्रभ के मनुष्य होने के कारण उसे कन्या देना मय ने अनुचित नहीं समझा। वह
तरुण सूर्यप्रभ उसके (सुमाया के) साथ सुख-विलास करने लगा ॥१४१॥
वह राजा अपनी विद्या के प्रभाव से अनेक देह धारण करके सभी असुर-कन्याओं के साथ
एक ही समय में पृथक्-पृथक् रहने लगा ॥१४२॥