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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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अष्टम लम्बक १०१
और, देवताओं से जीतकर लाए हुए रत्न और महामूल्य मणियों के शिखरों के
ढेर उस कन्या और जामाता को दहेज में प्रदान किये ॥११३-११४॥
तब महस्त्विका ने पिता से स्वतन्त्रतापूर्वक कहा— 'पिताजी मेरी उन बारह सखियों को
भी इन्हें दे दो' ॥११५॥
तब प्रह्लाद ने कहा— 'बेटी वे कन्याएँ मेरे भाई के द्वारा अपहरण करके बन्दिनी बनाई
गई हैं, इसलिए वे उसी के आधीन हैं। अतः, उनमें से किसी का मेरा दान करना उचित
नहीं है ॥११६॥
विवाहोत्सव सम्पन्न होने के पश्चात् दिन व्यतीत होने पर (रात्रि में) सूर्यप्रभ महस्त्विका
के साथ शयनागार में गया और विविध हास-विलास तथा काम-भोग के साथ रात्रि व्यतीत
की ॥११७-११८॥
दूसरे दिन प्रातःकाल अपने सभा के साथ प्रह्लाद के सभा में पधारने पर अभीक नामक
दानवराज ने उनसे कहा—॥११९॥
'आज आप सब लोगों को मेरे घर पर पधारना चाहिए क्योंकि मैं वहाँ राजा सूर्यप्रभ
का आतिथ्य-सत्कार करूँगा ॥१२०॥
यदि आप लोग उचित समझें तो मैं अपनी कन्या कलावती को भी उसे दूँ'। उसके इस
प्रस्ताव को सभी ने 'ठीक है, कहकर स्वीकार कर लिया और सभी उठकर मय-सुनीथ और
सूर्यप्रभ के साथ दूसरे पाताल में गये ॥१२१-१२२॥
वहाँ पर राजा अभीक ने अपनी कन्या कलावती का सूर्यप्रभ के साथ विधिपूर्वक पाणिग्रहण
करा दिया ॥१२३॥
तदनन्तर, सभी असुरों के सहित सूर्यप्रभ ने प्रह्लाद के घर में भोजन करके विविध
भोगों के साथ दिन व्यतीत किया ॥१२४॥
तीसरे दिन इसी प्रकार दुष्टारोह नामक असुरराज ने अपने पाँचवें रसातल में सभी लोगों
को निमंत्रित किया ॥१२५॥
और उसने अपनी कुमुद्वती नाम की कन्या को औरों के समान विधिपूर्वक सूर्यप्रभ को
दान कर दिया ॥१२६॥
तदनन्तर सूर्यप्रभ मित्र-मंडल के साथ विविध सुखों के भोग में दिन बिताकर रात को
कुमुद्वती के शयन-गृह में गया ॥१२७॥