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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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Page 316

अष्टम लम्बकः २८५
यह उसी राजा अभीक की प्राणों से भी प्यारी कन्या कलावती है। वह राजा अभीक उस
दिन ऋषि के पास जाकर जब लौटा तब उसने कहा कि 'अहोभाग्य है हमारा जिसे आज
पुनर्जीवित मुनीथ को पुनः देखा और सुमुण्डीक के अवतार सूर्यप्रभ को भी देखा॥१९३-१९४॥
इस युवक मुमुण्डीक सूर्यप्रभ को शिवजी ने विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती बनाया है। इसलिए,
यहाँ आये हुए सुमुण्डीक का सानन्द-पूर्ण सम्मान करता हूँ अपनी कन्या कलावती को सूर्यप्रभ के लिए
देता हूँ। मुनीथ का और हमारा गोत्र एक है, अतः उसे देना उचित नहीं है। सूर्यप्रभ उसका पुत्र है,
किन्तु राजा के जन्म में असुर के जन्म में नहीं। अतः, मुनीथ के पुत्र का सम्मान उसी का
सम्मान है' ॥१९५-१९७॥
पिता के ये वचन सुनकर तुम्हारे रूप से आकृष्ट होकर तुम्हें देखने के कौतूहल से यह मेरी
सखी यहाँ आई है ॥१९८॥
सहेली के इस प्रकार कहने पर उसके कथन का रहस्य जानने के लिए सूर्यप्रभ कृत्रिम नींद
में सो गया ॥१९९॥
तदनन्तर वह कन्या जागते हुए प्रहस्त के समीप धीरे से गई और सहेली द्वारा सारा
वृत्तान्त उसे कहलाकर बाहर चली गई ॥२००॥
प्रहस्त भी अपनी शय्या से उठकर सूर्यप्रभ के पास गया और बोला—'राजन् जागते
हो या नहीं'। सूर्यप्रभ ने भी अधखुली आँखों से कहा—॥२०१॥
'मित्र जागता हूँ। मुझ अभागे को आज नींद कहाँ ?—एक विशेष बात तुमसे कहना हूँ
तुमसे छिपाकर ही क्या करना है॥२०२॥
अभी-अभी एक सहेली के साथ आई हुई एक कन्या को मैंने देखा जिसके समान सुन्दरी
कन्या तीनों लोकों में नहीं है॥२०३॥
वह मेरे मन को चुराकर क्षण भर में ही अदृश्य हो गई। तू उसे अभी जाकर ढूँढ़। यही
कहीं होगी' ॥२०४॥
सूर्यप्रभ द्वारा इस प्रकार कहा गया प्रहस्त बाहर निकला और सहेली के साथ खड़ी उस
कन्या को देखकर इस प्रकार कहने लगा—'मैंने तुम्हारे अनुरोध से अपने स्वामी को जगा
दिया है अब तुम मेरे अनुरोध से उसे फिर दर्शन दो ॥२०५-२०६॥
आँखों को मदन करनेवाले उनके सुन्दर रूप को देख लो। दर्शन से ही शान्त किया
हुआ यह भी दुःसह रोग से ॥२०७॥