कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
Page 310 of 1079
Read in contextयह सुनकर मय ने विभीषण से कहा—'हम जबरदस्ती बैर नहीं कर रहे हैं किन्तु इन्द्र
के निरर्थक हठ को सहन कैसे करें, तुम ही बताओ ।।१४८।।
देवताओं ने जिन असुरों को मारा है वे प्रमादी थे। बलि प्रह्लाद आदि सावधान असुर
नहीं मारे गए ।।१४९।।
मय द्वारा इस प्रकार कहा गया विभीषण सबसे मिलकर उसी समय मन्दोदरी को
साथ लेकर लंका को लौट गया ।।१५०।।
तदनन्तर, सुनीथ और सूर्यप्रभ को साथ लेकर राजा बलि को देखने के लिए वह
दानवराज तीसरे पाताल को गया ।।१५१।।
स्वर्ग से भी अधिक सुन्दर उस लोक में उन्होंने हार और मुकुट धारण किये हुए तथा दैत्यों
और दानवों से घिरे हुए राजा बलि को देखा ।।१५२।।
वे सुनीथ आदि सभी राजा बलि के चरणों पर गिरे और उसने भी उन सब का समुचित
स्वागत-सम्मान किया ।।१५३।।
मय दानव द्वारा समस्त वृत्तान्त जानकर प्रसन्न हुए राजा बलि ने शीघ्र ही प्रह्लाद
तथा अन्य दूसरे दानवों को बुलवाया ।।१५४।।
सुनीथ आदि ने उनके चरणों पर गिरकर प्रणाम किया और वे सभी उन विनम्र लोगों
को देखकर आनन्द-विभोर हो गये ।।१५५।।
तब बलि ने कहा—'यह हमारा सजीव पृथ्वी पर चन्द्रप्रभ के रूप में जन्म लेकर अपने शरीर
में आकर पुनर्जीवित होगया ।।१५६।।
सुपुण्डीक का अवतार यह सूर्यप्रभ भी आया है। शिवजी ने इसे विद्याधरों का भावी
चक्रवर्ती बनाया है ।।१५७।।
उसके यज्ञ के प्रभाव से मेरे बन्धन ढीले हुए हैं। अतः इन दोनों के पुनः प्राप्त होने पर
हम लोगों का अभ्युदय ही होनेवाला है' ।।१५८।।
बलि के वचन सुनकर उनका गुरु शुक्र बोला—'धर्म का आचरण करो। सद्-मार्ग पर
जाने से अवनति कदापि नहीं होती ।।१५९।।
अतः धर्म का व्यवहार करो यह मेरा वचन मानो। यह सुनकर सभी दानवों ने धर्म
के चलने का नियम बना लिया ।।१६०।।
सातो पातालों के राजा वहाँ एकत्र हुए और सुनीथ की पुन्र्जाति की प्रसन्नता
में तीन व महान् उत्सव मनाया १६१।।
इसी बीच फिर नारद मुनि वहाँ आ पहुँचे। पूजा सत्कार पाकर बैठने के बाद उन्होंने
दानवों से कहा—।।१६२।।