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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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अष्टम लम्बक २७५

तब मय ने चन्द्रप्रभ से कहा-'यह वही तुम्हारा पहला शरीर है। इसमें प्रवेश
करो' ॥११८॥
तदनन्तर, चन्द्रप्रभ ने मय की बताई हुई योग-युक्ति से अपने शरीर को त्याग कर उस
शरीर में प्रवेश किया ॥११९॥
उसकी आत्मा के प्रवेश करने पर वह सोया हुआ शरीर जंभाई लेकर और धीरे-धीरे
आँखें खोलकर नींद से जागे हुए के समान उठ खड़ा हुआ¹ ॥१२०॥
'हमारे भाग्य से राजा मुनीथ पुनः जीवित हो उठे' इस प्रकार पुर-वासियां कोलाहल
करने लगीं ॥१२१॥
इधर चन्द्रप्रभ के निर्जीव शरीर को गिरा हुआ देखकर सूर्यप्रभ आदि सभी सहसा
खिन्न हो उठे ॥१२२॥
चन्द्रप्रभ (सुनीथ) ने मानों सोए हुए से उठकर पिता मय का सामने देखकर उसके
चरणों में प्रणाम किया ॥१२३॥
मय ने भी प्रेम से उसका आलिंगन करके उससे पूछा 'बेटा ! क्या पिछले दो जन्मों का
अब स्मरण करते हो ? ॥१२४॥
उसने कहा- स्मरण करता हूँ। इतना ही नहीं। उसने चन्द्रप्रभ जन्म में और मुनीथ
जन्म में जो कुछ भी हुआ था सब सुना दिया ॥१२५॥
तदनन्तर, उसने पूर्व जन्म की रानियों एवं सूर्यप्रभ आदि के नाम लेकर तथा उसके भी
पूर्व की दानवी पत्नियों के भी इसी प्रकार नाम ले-लेकर आश्वासन दिया ॥१२६॥
और, चन्द्रप्रभ के निर्जीव शरीर को ओषधियों और घी से लेपकर युक्तिपूर्वक सुरक्षित
कर दिया कि सम्भव है कभी काम आवे ॥१२७॥
तब पूर्ण विख्यात होकर सूर्यप्रभ आदि ने प्रणाम करते हुए उनका अभिनन्दन
किया ॥१२८॥
अत्यन्त हर्षित मयासुर उन सब को उस नगर से दूसरे शोभन नगर में ले
गया ॥१२९॥
उसमें जाकर उन सब ने हीरे से बनी हुई एक स्वच्छ सुन्दर बावली देखी जो अमृत रस से
भरी थी। सभी उसके किनारे बैठ गये ॥१३०॥
और वे सुनीथ की दानवी स्त्रियों द्वारा लाये गये मणियम पात्रा में अमृत रस का पान
करने लगे ॥१३१॥
उस अमृत-पान मात्र से सभी लोग सोकर उठे हुए-से महान् बल और पराक्रम से युक्त
दिव्य शरीरधारी हो गये ॥१३२॥


१ चीन देश में इस प्रकार के विचार बनने से ऐसा वहाँ की कथाओं में प्रतीत
होता है। बौद्ध लोग ऐसे विचारों को यहाँ से गये हों ऐसा संभव है।—अनु.