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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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तुम दूसरे देवताओं की परवाह न करके केवल एक रुद्र की आज्ञा से जो कुछ घमंड के
साथ कर रहे हो वह तुम्हारे हित के लिए न होगा' ॥१९॥
नारदजी के ऐसा कहने पर दानवराज मय हँसकर बोला—हे महामुनि देवेन्द्र ने जो कहा है
वह उचित नहीं है। वह जो कहता है कि सूर्यप्रभ मनुष्य है यह मिथ्या-कथन है। इस बात को
दामोदर-संग्राम में इन्द्र ने नहीं देख लिया था कि वह अलौकिक मानव है ? मनुष्य सत्त्ववान् प्राणी है,
अतः वह सभी सिद्धियों का अधिकारी है। क्या राजा नहुष आदि ने इन्द्र-पद की सिद्धि नहीं
प्राप्त की थी ? और भी इन्द्र जो यह कहता है कि श्रुतशर्मा को हमने विद्याधर-चक्रवर्ती
का पद प्रदान किया है तथा वह पद उसके कुलक्रम से चला आ रहा है, यह भी विरुद्ध बात है।
महेश्वर शिव जिसके दाता हैं उसमें किसी प्रकार की प्रामाणिकता की क्या आवश्यकता है ?
दूसरे, बड़ा भाई होने के कारण हिरण्याक्ष को इन्द्र-पद मिलना चाहिए था उस पर उसने कैसे
अपना अधिकार कर लिया ? ॥२०-२४॥
और भी इन्द्र ने जो यह सन्देश दिया कि इस प्रकार हमारी तुम्हारे साथ शत्रुता ठन जायगी
यह भी ठीक नहीं क्योंकि इन्द्र केवल अपने हठ के कारण हमसे शत्रुता रखता है। फिर, इसमे अधर्म
की भी कौन-सी बात है। हम तो शत्रु पर विजय प्राप्त करके क्षात्र धर्म का पालन ही कर रहे हैं,
न कि उसके समान मुनि-पत्नी¹ का अपहरण कर रहे हैं और न उसके समान ब्रह्महत्या² ही कर
रहे हैं ॥२५ २६॥
और, इन्द्र जो कहता है कि अश्वमेध यज्ञ की आज्ञा की अवहेलना करके हमने देवताओ
का अपमान किया है यह भी उसका प्रलाप-मात्र है क्योंकि रुद्र-यज्ञ कर लेने पर फिर अन्य यज्ञों का
क्या महत्त्व रह जाता है ॥२७॥
देवाधिदेव महादेव की अर्चना कर लेने पर किस देवता की अर्चना नही हो जाती ? वह
जो कहता है कि वज्रप्रभ की एकमात्र आस्था शिव पर ही है और वह उसके हित के लिए नहीं है,
यह भी अनुचित है ॥२८॥
जहाँ स्वयं शिवजी उद्यत हैं, वहाँ अन्य देवताओं की बात ही क्या ? सूर्य के उदय होने पर
अन्य तेज-समूह क्या फीके नहीं पड़ जाते ? ॥२९॥
इसलिए हे मुनिवर, तुम जाकर यह सब देवराज इन्द्र से कहो। हम अपना प्रस्तुत कार्य
करते हैं और वह भी जो चाहे, करे' ॥३०॥
मयासुर द्वारा इस प्रकार कहे गये देवर्षि नारद प्रतिसन्देश लेकर देवराज इन्द्र के समीप
गये ॥३१॥
नारद मुनि के चले जाने पर इन्द्र के सन्देश से शंकित राजा वज्रप्रभ से मयासुर ने
कहा—॥३२॥


१ यह इन्द्र का गौतम-पत्नी अहल्या के साथ समागम-रूपी अनाचार पर
व्यंग्य है।—अनु
२ यह ब्राह्मण वृत्रासुर को मारने पर व्यंग्य है।—अनु