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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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अष्टम लम्बक २१५

'यह सूर्यप्रभ विद्याओं की सिद्धि से प्रभावशाली होकर, हम लोगों के साथ उसे जीत कर,
विद्याधर-चक्रवर्ती का पद प्राप्त करेगा' ॥३२॥
मय के ऐसा कहने पर राजा चन्द्रप्रभ ने कहा—'मैं धन्य हूँ और यह सूर्यप्रभ भी
पुण्यवान् है आप अपनी इच्छानुसार इस से कार्य' ॥३३॥
तदनन्तर चन्द्रप्रभ से परामर्श कर और उससे आज्ञा प्राप्त सूर्यप्रभ को उसके मित्र मन्त्रियों
के साथ मयासुर पाताल ले गया ॥३४॥
पाताल ले जाकर मयासुर ने सूर्यप्रभ को जैसे-जैसे उपदेश किया उसने भी मन्त्रियों के
साथ वैसे ही वैसे तपस्याओं द्वारा विद्याओं की सिद्धि प्राप्त की ॥३५॥
अन्य विद्याओं के अतिरिक्त मय ने उसे विमान की साधना का भी उपदेश दिया जिससे
उसने भूतासन नाम के विमान का निर्माण किया ॥३६॥
तदनन्तर मय उसी विमान पर आरूढ़ विद्याओं को सिद्ध किये हुए सूर्यप्रभ को उसके मित्र
मन्त्रियों के साथ उसके पिता राजा चन्द्रप्रभ के समीप ले आया ॥३७॥
उसे माता-पिता के समीप पहुँचाकर मय ने कहा— मैं जाता हूँ तुम अपनी सिद्धि से
सांसारिक भोगों को भोगो तबतक मैं फिर आऊँगा' ॥३८॥
ऐसा कहकर और सूर्यप्रभ से सत्कृत मयासुर चला गया और राजा चन्द्रप्रभ पुत्र की विद्या
सिद्धि से बहुत प्रसन्न हुआ ॥३९॥
तदनन्तर सूर्यप्रभ विद्याओं की सिद्धि के प्रभाव से अपने मन्त्रियों के साथ विमान
के द्वारा भिन्न-भिन्न देशों में स्वेच्छापूर्वक घूमने लगा ॥४०॥
जहाँ जहाँ जो-जो राजकुमारी उसे देखती थी वह-वह उस पर मोहित होकर उसका वरण
कर लेती थी ॥४१॥
उनमें ताम्रलिप्ती के राजा वीरभट की अद्वितीय सुन्दरी पुत्री मदनसेना पहली
राजकुमारी थी ॥४२॥
दूसरी अपरान्त (कोंकण) के राजा सुभट की चन्द्रिकावती कन्या थी जिस सिद्ध लोग
कहीं से लाकर सुभट के पास छोड़ गये थे ॥४३॥
तीसरी अत्यन्त सुन्दरी कन्या कांची नगरी के राजा कुम्भीर की वल्लभसेना
नाम की थी ॥४४॥


१ यह प्रदेश आजकल गोआ में सन्निग्ध है।—अनु०
२ कांची मद्रास के पास प्रसिद्ध पुण्यपुरी है। यहाँ के पल्लव राजा प्रसिद्ध थे।—अनु०