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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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Page 254

सप्तम लम्बक ५५५
तदनन्तर आकाश-यान की थकावट दूर करके नरवाहनदत्त माता-पिता एवं पत्नियों के
साथ अपने नगर के भवन में आया ॥२५९॥
घर पर आकर उसने अपने आश्रितों (सेवकों) बन्धुओं तथा मित्रों को भी खोलकर
पुरस्कार प्रदान किया और श्वशुर के द्वारपाल तथा विमान-चालक प्राणधर को धन रत्न
आदि से भर दिया ॥२६०॥
भोजन करने के बाद प्रणाम करते हुए प्राणधर ने नरवाहनदत्त से निवेदन किया कि
महाराज ! राजा कर्पूरक ने हम दोनों (मुझे और प्रतीहार) को ऐसी आज्ञा दी है कि मेरी
कन्या के उसके पति के घर पहुँच जाने पर तुरन्त लौट आना जिससे मैं शीघ्र उसे सकुशल
वहाँ पहुँची हुई जान सकूँ॥२६१-२६२॥
इसलिए, हम दोनों को निश्चय ही वहाँ अभी जाना चाहिए। आप हम दोनों
को कर्पूरिका से अपने हाथ का लिखा हुआ पत्र दिलाइए ॥२६३॥
बिना हस्तलिखित पत्र के कन्या के प्रति स्नेही राजा का हृदय आश्वस्त न होगा। उसे
विमान पर चढ़ने के कारण कर्पूरिका के डर से गिर जाने की शंका बनी होगी ॥२६४॥
इसलिए, आप पत्र-प्रदानपूर्वक मेरे साथ ही विमान चलाने की प्रतीक्षा करते हुए
उस प्रधान प्रतीहार को प्रस्थान करने की आज्ञा प्रदान करें ॥२६५॥
हे युवराज ! मैं तो अपने कुटुम्ब को साथ लेकर फिर यहीं आऊँगा। मैं आपके इन
अमृतमय चरण-कमलों को नहीं छोड़ूँगा' ॥२६६॥
इस प्रकार, प्राणधर के कहने पर नरवाहनदत्त ने कर्पूरिका को पत्र लिखने को निर्देश
किया ॥२६७॥
'पिताजी ! अच्छे पति के सुख को पानेवाली मेरे लिए आप किसी प्रकार की चिन्ता न
करें। क्या उत्तमपुरुष (विष्णु) को प्रदान की गई लक्ष्मी के लिए चिन्ता करना योग्य
है? ॥२६८॥
इस प्रकार कर्पूरिका के हस्तलिखित पत्र के देने पर धन-मान आदि से सत्कृत प्राणधर और
प्रतीहार को वत्सराजपुत्र नरवाहनदत्त ने विदा किया ॥२६९॥
आश्चर्य-चकित जनता द्वारा देखे गये वे दोनों विमान पर चढ़कर आकाश-मार्ग से समुद्र
को पार कर कर्पूरसम्भव द्वीप को पहुँचे। वहाँ पर उन्होंने कन्या की पति-गृह में पहुँचने का समाचार
सुनाकर और कर्पूरिका का पत्र देकर राजा कर्पूरक को आनन्दित किया ॥२७०-२७१॥
दूसरे दिन प्राणधर कर्पूरक राजा से आज्ञा लेकर अपने कुटुम्ब के साथ छोटे भाई
राज्यधर का सम्मान करता हुआ पुनः नरवाहनदत्त के पास ही आ गया ॥२७२॥
नरवाहनदत्त ने भी आये हुए परम उपकारी प्राणधर को, अपने भवन के समीप ही
निवास-स्थान और बड़ी वृत्ति (जीविका) प्रदान की ॥२७३॥
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