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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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Page 250

सप्तम लम्बक २२१
'क्या तुम राज्यधर के बड़े भाई हो जो भिन्न-भिन्न प्रकार के महान् यन्त्रों का जानकार
है? ॥२३१॥
'हाँ मैं वही उसका भाई प्राणधर हूँ। आप हम दोनों को कैसे जानते हैं स्वामी! —
प्राणधर ने नम्र होकर यह कहा ॥२३२॥
तब नरवाहनदत्त ने उसे जिस प्रकार देखा था और राज्यधर ने जैसा कहा था वह
सब प्राणधर को सुना दिया ॥२३३॥
तदनन्तर, प्राणधर द्वारा लाये गये महाविमान पर अपने श्वशुर राजा कर्पूरक से आज्ञा
प्राप्त करके नरवाहनदत्त दहेज में प्राप्त दासियाँ सोना कपूर के ढेर राजा से प्राप्त प्रतीहार¹
और विमानचालक (प्राणधर) के साथ बैठा ॥२३४-२३५॥
उसकी सास ने प्रस्थानिक मंगलाचार किया और नरवाहनदत्त ने नववधू कर्पूरिका का
हाथ बिठा दिया। इस प्रकार, अपने मित्र गोमुख के साथ नरवाहनदत्त ने ब्राह्मणों को वस्त्र आदि
दान देकर प्रस्थान किया ॥२३५-२३६॥
और, प्राणधर से कहा कि चलो समुद्र के पूर्वतट पर राज्यधर के समीप तक चलें। तब
अपने घर की ओर चलेंगे ॥२३७॥
तदनन्तर चालक द्वारा चलाये गये उस विमान से वह अपने साथियों और सामान के
साथ आकाश में उड़ा और कुछ ही क्षणों में समुद्र के पार बंधे हुए राज्यधर के हेमपुर नगर में
पहुँचा ॥२३८-२३९॥
नरवाहनदत्त ने वहाँ पर नमस्कार करते हुए और भाई को देखने से प्रसन्न तथा
दासी-हीन उस राज्यधर का दासियों द्वारा सत्कार किया और आँसू बहाते हुए तथा किसी प्रकार
छोटे भाई (राज्यधर) से बिदा लिये हुए प्राणधर के साथ उसी विमान द्वारा नरवाहनदत्त
कौशाम्बी पहुँचा ॥२४०-२४१॥
बिना किसी शंका के निर्भय होकर आकाश से उतरते हुए और पत्नी एवं दासियां
आदि के साथ आये हुए नरवाहनदत्त को देखकर कौशाम्बी की जनता आश्चर्यचकित हो
गई ॥२४२॥
नागरिकों के उत्साह को देखकर और अपने पुत्र को आता हुआ समझकर उसका
पिता वत्सराज अपनी महारानियों मन्त्रियों और बहुओं के साथ प्रसन्न होकर उसे लेने के लिये
आगे आया ॥२४३॥
विमान पर चढ़ने के कारण विद्याधर-चक्रवर्ती होने की सूचना देते हुए राजा उदयन ने
चरणों में झुके वधू-सहित पुत्र नरवाहनदत्त का अभिनन्दन किया ॥२४४॥


१. द्वारपाल