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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

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सप्तम लम्बक १९३
उस काँची में बाहुबल नाम का प्रसिद्ध राजा है, जिसने अपनी भुजाओं के बल से उपार्जित
चंचला लक्ष्मी को भी अपने कोष (खजाने) में बाँध रखा है ॥२१॥
उस राजा के राज्य में मयदानव से आविष्कृत यंत्रों के निर्माण में कुशल हम दो बढ़ई भाई
रहते थे ॥२२॥
प्राणधर नाम का बड़ा भाई वेश्या-व्यसन में प्रसिद्ध था। उसका भक्त छोटा भाई मैं
राज्यधर नाम से प्रसिद्ध हूँ ॥२३॥
मेरे बड़े भाई ने अपनी कमाई के तथा पिता के धन को खा डाला और कुछ मेरे द्वारा
स्नेह से दिये गये धन को भी उड़ा दिया ॥२४॥
तो भी अत्यन्त व्यसनी उसने वेश्या के लिए धन हरण करने के लिए रस्सी से बँधे हुए
काठ के हंसों की जोड़ी बनाई ॥२५॥
वे हंस रस्सी के हिलाने से रात को राजा के खजाने में रोशनदान से अन्दर घुसकर
अपनी चोंच में पेटियों में रखे हुए आभूषणों को यन्त्र के द्वारा अपने मालिक (मेरे भाई) के
पास ले आते थे ॥२६-२७॥
मेरा बड़ा भाई उन आभूषणों को बेचकर उस धन को वेश्या के साथ भोगता था ॥२८॥
मेरे बहुत मना करने पर भी वह इस अनुचित कार्य से रुका नहीं। व्यसनों में अन्धा कौन
भले या बुरे मार्ग को देखता है ॥२९॥
इस प्रकार रात में दृढ़ता से बन्द किये गये और चूहा से रहित उस गोदाम में चोरी
होने के कारण कुछ दिनों के अनन्तर भाण्डार का अधिकारी भय से सर्वदा इस चोरी का पता
लगाने की चिन्ता में अत्यन्त सन्तप्त और दुःखी हो गया और उसने राजा के समीप जाकर स्पष्ट
रूप से निवेदन कर दिया ॥३०-३१॥
राजा ने भाण्डारी तथा अन्यान्य सिपाहियों को रात में चोरी का पता
लगाने के लिए नियुक्त कर दिया। उन रखवालों ने रात को यन्त्र से बने हुए और रस्सी
से बँधे हंसों को रोशनदान से घुसते हुए और माल उठाते हुए देख लिया और उन्हें पकड़
लिया। रस्सारूप यंत्र की युक्ति से घूमनेवाला काठों से गढ़ा हंसद्वय हुए और टूटी हुई
रस्सी वाले उन हंसों को प्रातः काल राजा को दिखाने के लिए पकड़ रखा ॥३२-३४॥
उसी समय मेरे भाई ने घबड़ाये हुए आकर मुझसे कहा कि गोदाम के रखवालों ने मेरे
हंसों को पकड़ लिया है ॥३५॥
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